Wednesday, June 3, 2020

भक्त श्री बिल्वमंगल (2)

(ख) सात्विक परिवर्तन [2]

बिल्वमंगल को फिर मोह हुआ। वह युवती के पीछे पीछे उसके मकान तक गया। युवती अपने घर के अंदर चली गई, बिल्वमंगल उदास होकर घर के दरवाजे पर बैठ गया। घर के मालिक ने बाहर आकर देखा कि एक मलीन मुख्य अतिथि ब्राह्मण बाहर बैठा है। उसने कारण पूछा। बिल्वमंगल ने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहां की 'मैं एक बार फिर उस युवती को प्राण भर कर देख लेना चाहता हूं तुम उसे यहां बुलवा दो।' युवती उसी ग्रह की धर्मपत्नी थी, अतिथिवत्सल गृहस्थ अपनी पत्नी को बुलाने के लिए अंदर गया। इधर बिल्वमंगल को अपनी अवस्था का यथार्थ ज्ञान हुआ, हृदय शोक से भर गया और ना मालूम क्या सोचकर उसने पास के बेल के पेड़ से दो कांटे तोड़ लिए। इतने में ही गृहस्थ की धर्मपत्नी वहां आ पहुंची, बिल्वमंगल ने उसे फिर देखा और मन ही मन अपने को धिक्कार देकर कहने लगा कि 'अभागी आंखें! यदि तुम ना होती तो आज मेरा इतना पतन क्यों होता?' इतना कहकर बिल्वमंगल मैं उन दोनों कांटो को दोनों आंखों में भोंक लिया! आंखों से रुधिर की अजस्र धारा बहने लगी! गृहस्थ और उसकी पत्नी को बड़ा दुख हुआ, परंतु वे बेचारे निरूपाय थे। बिल्वमंगल का बचा-कुचा चित-मल भी आज सारा नष्ट हो गया और अब तो वह उस अनाथ के नाथ को अति शीघ्र पाने के लिए बड़ा ही व्याकुल हो उठा। उसके जीवन नाटक का यह तीसरा पट-परिवर्तन हुआ।

(ग) बिलवामंगल पर भगवान की कृपा

परम प्रियतम श्री कृष्ण के वियोग की दारुण व्यथा से उसकी फूटी आंखों ने चौबीसों घंटे आंसुओं की झड़ी लगा दी। ना भूख का पता है ना प्यास का, ना सोने का ज्ञान है और न जागने का। 'कृष्ण-कृष्ण' की पुकार से दिशाओं को गूंजता हुआ बिल्वमंगल जंगल-जंगल और गांव-गांव में घूम रहा है! ऐसी दशा में प्रेम में श्री कृष्णा कैसे निश्चिंत रहें सकते हैं। एक छोटे से गोप बालक के वश में भगवान बिल्वमंगल के पास आकर अपनी मुनि-मनमोहिनी मधुर वाणी से बोले- 'सूरदास जी! आपको बड़ी भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूं, जल भी लाया हूं; आप इसे ग्रहण कीजिए।' बिल्वमंगल के प्राण तो बालक के उस मधुर स्वर से ही मोहे जा चुके थे, उसके हाथ का दुर्लभ प्रसाद पाकर तो उसका हृदय हर्ष के हिलोरों से उछल उठा! बिल्वमंगल ने बालक से पूछा, 'भैया! तुम्हारा घर कहां है, तुम्हारा नाम क्या है? तुम क्या करते हो?'

बालक ने कहा, 'मेरा घर पास ही है, मेरा कोई खास नाम नहीं; जो मुझे जिस नाम से पुकारता है, मैं उसी से बोलता हूं, गाएँ चरा या करता हूं। मुझसे जो प्रेम करते हैं, मैं भी उनसे प्रेम करता हूं।'

बिल्वमंगल बालक की वीणा-विनिंदित वाणी सुनकर विमुग्ध हो गया! बालक जाते-जाते कह गया कि 'मैं रोज आकर आपको भोजन करवा जया करूंगा।' बिल्वमंगल ने कहा, 'बड़ी अच्छी बात है; तुम रोज आया करो।'

एक दिन बालक ने, उन नटवरनागर ने अपनी दीवाना बना देने वाली वाणी में कहा, 'बाबाजी! चुपचाप क्या सोचते हो? वृंदावन चलोगे?' वृंदावन का नाम सुनते ही बिल्वमंगल का हृदय हरा हो गया, परंतु अपनी असमर्थता प्रकट करता हुआ बोला- 'भैया! मैं अंधा वृंदावन कैसे जाऊं?' बालक ने कहा - 'यह लो मेरी लाठी, मैं इसे पकड़े-पकड़े तुम्हारे साथ चलता हूं!'

बिल्वमंगल कामुक खेल उठा, लाठी पकड़ कर भगवान भक्त के आगे-आगे चलने लगे। थोड़ी सी दूर जाकर बालक ने कहा -- 'लो! वृंदावन आ गया, अब मैं जाता हूं।' बिल्वमंगल ने बालक का हाथ पकड़ लिया, हाथ का स्पर्श होते ही सारे शहर में बिजली-सी दौड़ गई। सात्विक प्रकाश से सारे द्वार प्रकाशित हो उठे, बिल्वमंगल ने दिव्य दृष्टि पाई और उसने देखा कि बालक के रूप में साक्षात मेरे श्याम सुंदर ही हैं। बिल्वमंगल का शरीर रोमांचित हो गया, आंखों से प्रेम के अश्रुओं की अनवरत धारा बहने लगी। भगवान का हाथ उसने और भी जोर से पकड़ लिया और कहा-- 'अब पहचान लिया है, बहुत दिनों के बाद पकड़ सकता हूं। प्रभु! अब नहीं छोडूंगा।' भगवान ने कहा-- 'छोड़ते हो कि नहीं?' बिल्वमंगल ने कहा, 'नहीं, कभी नहीं, त्रिकाल में भी नहीं।'

भगवान ने जोर से झटका देकर हाथ छुड़ा लिया। हॉट छुड़ाते ही बिल्वमंगल ने कहा- 'जाते हो? पर स्मरण रखो--

हाथ छुड़ाये जात हौ, निबल जानि कै मोहि।

हिरदै तें जब जाहुगे, सबल बदौंगो तोही।।

भगवान ने बिल्वमंगल की आंखों पर अपना कोमल कर कमल फिराया, उसकी आंखें खुल गई। नेत्रों से प्रत्यक्ष भगवान को देखकर-- उनकी भुवन मोहिनी अनूप रूप राशि के दर्शन पाकर बिल्वमंगल अपने आप को संभाल नहीं सका। वह चरणों में गिर पड़ा और प्रेम के अश्रुओं से प्रभु के पावन चरण कमलों को धोने लगा।

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