(क) भक्त बिल्वमंगल का प्रारंभिक जीवन
दक्षिण प्रदेश में कृष्णवेणा नदी के तट पर एक ग्राम में रामदास नामक एक भगवद्भक्त ब्राह्मण निवास करते थे। उन्हीं के पुत्र का नाम था बिल्वमंगल। पिता ने यथासाध्य पुत्रों को धर्म शास्त्रों की शिक्षा दी थी।परंतु पिता माता की देहावसान के बाद संग दोष से बिलवमंगल के अंत: कारण में अनेक दोषो ने अपना घर कर लिया। यहां तक कि वह चिंतामणि नामक एक वेश्या के रूप पर आसक्त हो गया। आज बिल्वमंगल के पिता का श्राद्ध है, विद्वान कुल पुरोहित बिलवमंगल से श्राद्ध के मंत्रों की आवृत्ति करवा रहे हैं, परंतु उसका मन 'चिंतामणि' की चिंता में निमग्न है। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।किसी प्रकार श्राद्ध समाप्त कर जैसे-तैसे ब्राह्मणों को झटपट भोजन करवाकर बिल्वमंगल चिंतामणि के घर जाने को तैयार हुआ।संध्या हो चुकी थी लोगों ने समझाया कि 'भाई !आज तुम्हारे पिता का श्राद्ध है, वेश्या के घर नहीं जाना चाहिए।' परंतु कौन सुनता था।बिल्वमंगलदौड़कर नदी के किनारे पहुंचा। अकस्मात प्रबल वेग से तूफान आया और उसी के साथ मूसलाधार वर्षा होने लगी, रात दिन नदी में रहने वाले केवटों ने भी नावो को किनारे बांधकर वृक्षों का आश्रय लिया, परंतु बिल्वमंगलपर इन सब का कोई असर नहीं पड़ा। उसने केवटों से उस पार ले चलने को कहा, उतराई का भी गहरा लालच दिया; परंतु मृत्यु का सामना करने को कौन तैयार होता। अंत में वह अधीर हो उठा और कुछ भी आगा-पीछा न सोचकर तैरकर पार करने जाने के लिए सहसा नदी में कूद पड़ा। संयोगवश नदी में एक मुर्दा बाहर जा रहा था। बिल्वमंगल तो बेहोश था, उसने उसे काठ समझा और उसी के सहारे नदी के उस पार चला गया। कुछ ही दूर पर चिंतामणि का घर था। श्राद्ध के कारण आज बिल्वमंगलके आने की बात नहीं थी, अतएव चिंतामणि घर के सब दरवाजे को बंद करके निश्चिंत होकर सो चुकी थी।बिल्वमंगलने बाहर से बहुत पुकारा; परंतु तूफान के कारण अंदर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। बिल्वमंगलने इधर-उधर ताकते हुए बिजली के प्रकाशन में दीवार पर एक रास्ता सा लटकता देखा,तुरंत उसने उसे पकड़ा और उसी के सहारे दीवार फांद कर अंदर चला गया। चिंतामणि को जगाया। वह तो इसे देखते ही स्तंभित सी रह गई! नंगा बदन, सारा शरीर पानी से भीगा हुआ, भयानक दुर्गंध आ रही है। उसने कहा-'तुम इस भयावनी रात में नदी पार करके बंद घर में कैसे आये?'बिल्वमंगलने काठ पर चढ़कर नदी पार होने और रस्से की सहायता से दीवार पर चढ़ने की कथा सुनायी! वृष्टि थम चुकी थी। चिंता दीपक हाथ में लेकर बाहर आयी, देखती है तो दीवार पर भयानक काला नाग लटक रहा है और नदी के तीर पर साडा मुर्दा पड़ा है। बिल्वमंगल ने देखा और देखते ही कांप उठा। चिंतामणि ने भर्त्सना करके कहा-'तू ब्राह्मण है? अरे, आज तेरे पिता का श्राद्ध था, परंतु एक हाड-मांस कीपुतली पर तू इतना आसक्त हो गया कि अपने सारे धर्म-कर्मों को तिलांजलि देकर इस डरावनी रात में मुर्दे और सांप की सहायता से यहां दौड़ा आया!तू आज जिसे परम सुंदर समझ कर इस तरह पागल हो रहा है,उसका भी एक दिन तो वही परिणाम होने वाला है, जो इस सड़े मुर्दे का है! अरे!यदि तू इस प्रकार उस मनमोहन श्याम सुंदर से मिलने के लिए यू छटपटा कर दौड़ता तो अब तक उनको पाकर तू अवश्य ही कृतार्थ हो चुका होता।'वैश्या की वाणी में बड़ा काम किया! बाल्यकाल की स्मृति उसके मन में जाग उठी।पिताजी की भक्ति और उनकी धर्मप्राणता के दृश्य उसकी आंखों के सामने मूर्तिमान होकर नाचने लगे। बिल्वमंगल ने चिंतामणि के चरण पकड़ लिए और कहा-'माता! तूने आज मुझको दिव्यदृष्टि देकर कृतार्थ कर दिया।'मन- ही- मन चिंतामणि को गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी क्षण बिल्वमंगल के जीवन नाटक की योवनिका परिवर्तन हो गया।
(ख) सात्विक परिवर्तन
दोनों ने उस पूरी रात भर भगवान का भजन किया और प्रातः होते ही चिंतामणि ने हरिद्वार की और बिल्वमंगल ने संत श्री सोम गिरी जी महाराज के आश्रम की राह ली। वहां गुरुदेव से दीक्षा लेकर एक वर्ष तक आश्रम में ही रहकर भजन-पूजन किया, फिर वृंदावन धाम के लिए चल पड़ा। एक दिन अकस्मात उससे रास्ते में एक परम रूपवती युक्ति दिख पड़ी, पूर्व संसार अभी सर्वथा नहीं मिटे थे। यूपी का सुंदर रुप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे।
To be Continued...
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ReplyDeleteSai Bhagabata by Banaja Devi
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