Sunday, May 31, 2020

(ख) चंद्रहास के साथ धृष्ट बुद्धि का षड्यंत्र

चंद्रहास ने कुंतलपुर के राजा को कर देना बंद कर दिया था, राजा ने कर वसूल करने के लिए मंत्री धृष्ट बुद्धि के साथ सेना वहां भेजी। मंत्री को घर आया जानकर चंद्रावती के राजा ने उसका बड़ा सम्मान किया। मंत्री ने चंद्रहास को पहचान लिया कि यह वही बालक है। मन में खींझकर निश्चय किया कि कपट का जाल फैला कर अब इसे मारूंगा। कर लेने की बात पीछे पड़ गई। धृष्ट बुद्धि ने एक चिट्ठी लिखकर चंद्रहास को दी और कहा कि इसे मेरे लड़के मदन सिंह के हाथ में दे देना और कहना कि इसमें जो लिख लिखा कर लाया हूं, उस कार्य को जल्दी ही कर दीजिए। चंद्रहास जी पत्र लेकर कुंतलपुर को चलें। नगर के समीप एक बाग में सेवा समय जानकर रुके। आनंद मग्न होकर शालग्राम- भगवान की सेवा की, फिर विश्राम करने लगे और वही सो गए।

उसी बाग में मंत्री धृष्टबुद्धि की लड़की अपनी सहेलियों के साथ खेलती हुई आयी। चंद्रहास के सौंदर्य को देखकर उसे बड़ा अनुराग हुआ, फिर निकट से देखने के लिए अपनी सहेलियों से अलग होकर चंद्रहास के समीप आई और इनकी रूप माधुरी को देखकर उनमें प्रेमासक्त हो गई। शोभा सौंदर्य के मद से मतवाली उस लड़की ने चंद्रहास की पगड़ी में रखी हुई चिट्ठी को झुक कर धीरे से खींच लिया। उसे बाँचा तो उसमें लिखा था कि पुत्र मदन! बिना कुछ सोच विचार किए चिट्ठी लाने वाले इस बालक को शीघ्र विष दे दो। यह है बाँचकर मंत्री की लड़की अपने पिता पर नाराज हुई कि मेरा नाम लिखते लिखते ऐसी भूल की। उसका नाम विषया था। उसने आंख के काजल से विष के आगे 'या' और बना दिया, फिर आनंद की उमंग में मग्न अपनी सहेलियों में आ मिली और घर चली गई।

चंद्रहासजी उठे और मंत्री पुत्र मदन सिंह के पास आए। चंद्रहास उसे बहुत प्रिय लगे। उसने चंद्रहास को प्रेम पूर्वक गले से लगा लिया। चंद्रहास ने उसके हाथ में पत्र दिया, जिसे पढ़कर उसने कहा कि इसमें तो मेरे मन को अत्यंत प्रिय लगने वाली बात लिखी है। उसने जल्दी से ब्राह्मण को बुलवाकर एक ही घड़ी में चंद्रहास के साथ अपनी बहन विषया का विवाह कर दिया। कुछ समय बाद नीच धृष्ट बुद्धि आया। विवाह की बात सुनकर उसे ऐसा लगा मानो इधर-उधर घूम घूम कर मौत ही उस पर आ गई हो। चंद्रहास को दूलह के वेष में देखकर उसके मन में बड़ा भारी दुख हुआ।

धृष्ट बुद्धि ने एकांत में बैठकर अपने लड़के से पूछा कि तुमने यह भूल कैसे की? मदनसेन ने कहा कि मैंने बिल्कुल वही सब काम किया जो कि आपने अपने हाथ से पत्र में लिखा था। ऐसा कहकर उसने वह पत्र पिताजी को दिखा दिया। उसे पढ़ कर उसके शरीर में आग- सी लग गई। वह मन में विचारने लगा कि मैं तो बड़ा ही अभागा हूं, अभी मैं इसे मरवा डालूंगा। दासी पुत्र में आसक्त बेटी का विधवा हो जाना ही अच्छा है। ऐसा विचार कर उस धृष्टबुद्धि ने गुपचुप तरीके से नीच वधिको को बुलाकर कहा कि आप देवी के मंदिर में जाकर बैठो, वहां जो कोई पूजा करने आए, उसे मार डालना। फिर वह चंद्रहास से बोला कि आप जाकर देवी का पूजन कर आइए। वे मेरी कुलपूज्या है। विवाह के बाद अकेले ही जाकर वर द्वारा देवी पूजन की रीति मेरे वंश में सदा से चली आ रही है।

धृष्ट बुद्धि के कथन अनुसार चंद्रहास जी देवी का पूजन करने चले। इसी बीच कुंतलपुर के राजा ने सभा में कहा कि मेरे कोई लड़का नहीं है, इसलिए मंत्री के दामाद चंद्रहास को ही राज्य दे दूँ। सर्वसम्मति से निश्चय करके राजा ने मदनसेन से कहा कि तुम शीघ्र ही चंद्रहास जी को जाकर ले आओ। यह सुनकर मदन सेन सुख पाकर शीघ्र ही दौड़े। मार्ग में ही चंद्रहास को पाकर प्रसन्न हुए और बोले कि आप शीघ्र ही राज्यसभा में चले जाइए। राजा आपको राज्य देना चाहते हैं। आप देवी के अपमान से मत डरिए। उनका मानसिक ध्यान कर लीजिए। मैं आपके बदले जाकर देवी का पूजन करूंगा। यह कहकर मदन सेन देवी के मंदिर में गए। वहां जाते ही पहले से बैठे हुए वधिको को ने उन्हें मार डाला। इधर चंद्रहासजी के राज सभा में पहुंचते ही राजा ने उनका राज्य अभिषेक कर दिया। सभी लोग सम्राट चंद्रहास की जय-जयकार करने लगे।

Saturday, May 30, 2020

श्री चंद्रहासजी (क) अनाथ चंद्रहास पर भगवान शालिग्राम की कृपा

केरल में एक सुधार्मिक नाम का राजा था, उसी के पुत्र भक्त चंद्रहास जी हुए। जन्म के थोड़े दिन बाद ही इनके पिता संग्राम में वीरगति को प्राप्त हो गए और माता सती हो गई। शासन शत्रुओ के हाथ में चला गया। तब धाय मँमा चंद्रहास को लेकर कुंतलपुर चली गई और वहां के मंत्री धृष्ट बुद्धि के यहां रहने लगी तथा चंद्रहास को अपना बालक बताकर उसका पालन पोषण करने लगी। चंद्रहास अभी पाँच ही वर्ष के हुए थे कि धाय माँ का भी स्वर्गवास हो गया। अब अनाथ हो गए। चंद्रहास अपने सामान अवस्था वाले बालकों के साथ भक्ति रस वर्धक खेल खेला करते थे। एक दिन कृपालु नारद जी ने आकर दर्शन दिया और एक शालिग्राम की छोटी सी मूर्ति समेत भगवान नाम का उपदेश दिया। चंद्रहास जी नित्य उसकी पूजा करके उसे मुख में रख लेते थे। एक दिन धृष्ट बुद्धि के यहां ब्राह्मण भोज हुआ, संयोगवश चंद्रहास जी वही खेल रहे थे, जहां ब्राह्मणों में प्रधान विद्वान बैठे थे। उस समय धृष्ट बुद्धि ने वहां आकर पूछा कि मेरी कन्या का कैसा भाग्य है, इसे कैसा पति प्राप्त होगा? तब वे सब चंद्रहास की ओर संकेत करके बोल उठे कि यही तेरी कन्या का पति होना चाहिए। दासी पुत्र मेरी कन्या का पति होगा, यह जानकर वह लज्जा से घुल गया। दृष्टि बुद्धि बड़ी सोच विचार में पड़ गया कि यदि ऐसा हुआ तो मेरी बड़ी अप कीर्ति होगी। इसलिए अब यही विचार ठीक है कि इस लड़के को ही मरवा डाला जाए। ऐसा निश्चय करके उसने वधिको को को बुलाकर कहा कि इसे मार डालो। धृष्ट बुद्धि की आज्ञा से अधिक लोग चंद्रहास को दूर निर्जन वन में ले गए और कहने लगे- हम तुम्हें मारेंगे बताओ, अब तुम्हारा रक्षक कौन है? चंद्रहास ने कहा कि मैं तुमसे केवल एक बात मागँता हूँ कि तुम लोग थोड़ी देर रुको, जब मैं कहूं, तब मुझ पर हथियार चलाना।

वधिकों ने बात मानी ली, चंद्रहास ने अपने मुख से एक गोलशालिग्राम की मूर्ति को निकालकर वन के पत्र पुष्पों से उसकी प्रेम पूर्वक सेवा की। मूर्ति को पुन: मुख में रखकर ध्यान में तल्लीन हो गए। प्रभु की छवि को हृदय में धारण कर नेत्रों के इशारे से वधिको को मार डालने की आज्ञा दे दी। वधिक मूर्छित होकर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद वे सावधान हुए उनके ह्रदय में दया आ गई। चंद्रहास के बाएं पैर में 6 अंगुलियां थी, जो एक दोष था। वधिकों ने छठी अँगुली धृष्टबुद्धि को दिखाने के लिए काट ली। जो अच्छा ही हुआ। वधिको ने जाकर कटी अंगुली धृष्ठ बुद्धि को दिखा कर कहा कि हमने उसे मार डाला। उसने भी अंगुली पहचान कर उनकी बात को सत्य मान लिया।

कुंतलपुर के राजा के राज्य में एक छोटा राज्य और था, जिसकी राजधानी चंदनावती नगरी थी। वहां का राजा कुलिंद कुंतलपुर के राजा को प्रति वर्ष कर देता था। वह सब प्रकार के सुखों और संपत्तियों से संपन्न था, पर उसके कोई पुत्र नहीं था। वह उसी जंगल से होकर निकला और उस चंद्रहास को देखकर अति प्रसन्न हुआ; क्योंकि जिस पक्षी की छाया पड़ने से मनुष्य चक्रवर्ती सम्राट हो जाता है, उसी पक्षी ने अपने पक्ष से छाया कर रखी थी और हिरनिया चारों ओर से उसे घेरे खड़ी थी। चंदनावती के राजा कुलिंद ने निसंकोच दौड़कर बालक को गोद में उठा लिया और घर लाकर पुत्र जन्म के समान आनंद मंगल मनाया। कुछ दिनों के बीत जाने के बाद राजा ने सोच-विचार करके चंद्रहास को राज सिंहासन पर बैठा कर उसका राजतिलक कर दिया। चंद्रहासिनी राज्य पाकर अपने राज्य में भाव भक्ति का बड़ा भारी प्रचार प्रसार किया।

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Thursday, May 28, 2020

अंत नहीं है लोभ का...

एक बार एक नाई कहीं जा रहा था। जाते-जाते एक जगह एक पेड़ के नीचे अचानक उसे सुनाई दिया, मानो कोई कह रहा है, 'सात गड़ा धन लेगा?' नाई ने आश्चर्यचकित हो चारों ओर देखा, किंतु कहीं कोई दिखाई नहीं दिया। परंतु साथ घड़ा धन की बात सुनकर उसके मन में लालच पैदा हुआ और वह जोर से बोल उठा- 'हां, लूंगा!' त्यों ही उसे फिर वही आवाज सुनाई दी - 'अच्छा, तेरे घर पर रख आया हूं, जा, ले-ले।'

नाई ने घर आकर देखा, सचमुच ही साथ खड़े रखे हुए हैं। उसने सब घरों को खोल कर अच्छी तरह देखा, तो उसे दिखाई दिया कि झगड़े तो सोने की मोहरों से भरे हैं, पर सातवां घड़ा कुछ खाली है। उसके मन में सातवीं घड़े को भी पूरा भरने की तीव्र इच्छा उठी और उसने घर में जितना भी धन, गहने आदि थे, वह सब लाकर उस घड़े में डाल दिए। पर भला इतने से वह घड़ा कैसे भरता! घड़े को पूरा भरने के लिए नाई बड़ा व्याकुल रहने लगा। घर गृहस्ती के खर्च में कटौती करते हुए वह बचा हुआ सारा धन घड़े में डालने लगा। अंतिम में उसने राजा से प्रार्थना की कि उसे जो वेतन मिलता है, उससे उसका गुजारा नहीं हो पाता, दया करके वेतन बढ़ा दिया जाए। राजाओ सुनाई पर खुश था। उसके कहते ही राजा ने वेतन दुगना कर दिया। पर नाई की दशा पहले जैसे ही रही। अब तो वह लोगों से मांगकर खाता और पूरा वेतन घड़े में डाल देता। पर खड़ा था कि भरने का नाम ही नहीं लेता।

दिनों दिन नाई की हालत बिगड़ते देख एक दिन राजा ने पूछा- 'क्यों रे! तुझे जब कम वेतन मिलता था, तब तो तेरी गुजर-बसर अच्छी तरह से हो जाती थी, और अब दुगना वेतन पाकर भी तेरी ऐसी दशा क्यों है? तू क्या साथ घड़ा धन ले आया है?' नाई ने हक्का-बक्का होकर कहा- 'जी, आपको किसने बताया?' राजा ने कहा- 'अरे! वह तो यक्ष का धन है! उस समय यक्ष ने आकर मुझसे भी पूछा था, 'सात गड़ा धन लोगे?' मैंने पूछा- 'वह धन जमा करने के लिए है या खर्च करने के लिए?' तब वह बिना उत्तर दिए भाग गया। वह दिन कभी नहीं लेना चाहिए, उसे खर्च नहीं किया जा सकता, सिर्फ जमा ही करना पड़ता है। तू भला चाहता है, तो जल्दी बहुत धन लौटा आ।' तब नाई को होश आया और तब झटपट उस जगह पर जाकर चिल्ला कर बोल आया- 'तुम्हारा धन तुम ले जाओ, मुझे नहीं चाहिए।' यक्ष ने कहा- 'ठीक है।' घर लौटकर नाई ने देखा कि वह 7 घड़े गायब हो गए हैं। दुख की बात यह थी कि इतने दिनों तक पेट को काटते हुए उसने उस खाली घड़े में जो कुछ भी धन डाला था, वह सब भी चला गया।

"वास्तव में लोभ रूपी सातवां घोड़ा कभी नहीं भरता।"

Wednesday, May 27, 2020

काशी विश्वनाथ के बारे में सभी जानकारी (12 ज्योतिर्लिंगों में से एक)

काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है।ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है। महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभायात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।

निर्माण

वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 किग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था।

सामान्य तथ्य

हिंदू धर्म में कहते हैं कि प्रलय काल में भी इसका लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली यही भूमि बतलाई जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनकी नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होंने सारे संसार की रचना की अगस्त्यमुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थीउर्मी की अर्चना से श्री वशिष्ठ जी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मार्षि कहलाए।

महिमा

सर्वतीर्थमयी मोक्ष दायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राण त्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवागमन से छूट जाता है, चाहे वह मृत प्राणी भी क्यों ना हो। मत्स्य पुराण का मत है कि जप,ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों परपीड़ित जनों के लिए काशीपुरी ही एकमात्र गति है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने वाराणसी की स्थापना लगभग 5000 वर्षों पूर्व की थी। जिस कारण यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। ब्रह्मा पुराण, लिंग पुराण, मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिंदू ग्रंथों में इस नगर का उल्लेख किया जाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार वाराणसी को अत्यंत प्राचीन माना जाता है। वाराणसी के बारे में एक लेखक ने कहा था कि यह इतिहास से भी पुरातन है। वाराणसी शहर के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब रोशनी की सबसे पहली किरण यहीं पर पड़ी थी। स्कंद पुराण के काशी खंड में नगर की महिमा बताई जाती है जिसमें भगवान शिव ने एक श्लोक के जरिए वाराणसी का वर्णन किया है। यह शहर हिंदू धर्म में एक पवित्र नगर माना जाता है। साथ ही साथ बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना गया है। भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से जुड़ी हुई पौराणिक मान्यताएं और आश्चर्यजनक तथ्य भी जुड़े हुए हैं। यह शहर हर मायने में सबसे पूजनीय और पवित्र स्थल है। वाराणसी का सबसे पुराना उल्लेख महाभारत में मिलता है। आज सभी तीर्थ स्थल जो हम देख रहे हैं वे सब के सब प्राचीन समय में वन स्थलों में थे और मनुष्यों से रहे थे। कहीं-कहीं आदिवासियों का वास रहा होगा। कालांतर में कही गई कथाएं अस्तित्व में आई और तीर्थ बढ़ते गए। जिसके आसपास नगर और शहर भी बस गए। इस तीर्थ नगरी का नाम दो नदियों वरुणा और असी के नाम पर पड़ा। भारत की धार्मिक राजधानी की पवित्र यात्रा इस शहर की पवित्र गंगा नदी से एक अटूट और अहम रिश्ता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और देवी पार्वती का यहां निवास स्थान है ऐसा कहा जाता है जो भी सब से आखिर तक यहां जिंदा रहेगा उसे जरूर ही मोक्ष की प्राप्ति होगी।

वाराणसी एक ऐसा शहर है जहां आपको असंख्य संख्या में मंदिर देखने को मिल जाएंगे जो शैव तथा वैष्णव धर्म को समर्पित हैं। यह दोनों ही धर्म हिंदू धर्म के रूप हैं। यह जैन धर्म का भी प्रमुख केंद्र है। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का यहां जन्म हुआ था। यहां हर एक चौराहे पर एक मंदिर है। यहां काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, काल भैरव मंदिर, संकट मोचन मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारत माता मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर सभी प्रमुख मंदिरों में आते हैं।

कहा जाता है कि भगवान शिव जी काशी के परमात्मा है इसीलिए इसी वजह से अन्य ग्रह अपनी मर्जी से यहां कुछ भी नहीं कर सकते जब तक शिवजी का आदेश ना हो। ऐसा कहा जाता है जब शनि देवता भगवान शिव जी की खोज में काशी आए थे तब वे उनके मंदिर में लगभग साढे सात सालों तक प्रवेश नहीं कर पाए थे। आप जब काशी विश्वनाथ मंदिर में जाएंगे तो मंदिर के बाहर ही आपको शनिदेव का मंदिर दिखाई देगा। यह शहर आध्यात्मिक केंद्र के साथ-साथ आयुर्वेद और योग के समग्र प्राचीन विज्ञान से भी जुड़ा हुआ है। वाराणसी धार्मिक शहर तो है ही शिक्षा और संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र है।

यह व्यापारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र है यहां मुख्यत सोने तथा चांदी से किए हुए काम कथा बनारसी सिल्क साड़ियों के लिए भी जाना जाता है। वाराणसी में कई दार्शनिक कवि, लेखकों ने जन्म लिया जिनमें वल्लभाचार्य स्वामी रामानंद, जयशंकर प्रसाद, रविदास, शिवानंद गोस्वामी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि। यह सभी वाराणसी में ही रहे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिंदू धर्म का परम पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं पर लिखा था। वाराणसी के अश्वमेघ घाट में एक अजीबोगरीब रिवाज होता है जिसमें हर साल बारिश के मौसम में मेढ़को की शादी कराई जाती है। यहां के पंडित मेंडको की शादी के सारे अनुष्ठान पूरे करके उन्हें नदी में छोड़ देते हैं।

Tuesday, May 26, 2020

भगवान कृष्ण का जन्म [2]

"हे स्वामी! आपका अवतार, स्थिति तथा तिरोधान सारे भौतिक गुणों के प्रभाव से परे है। क्योंकि आप प्रत्येक वस्तु के नियामक तथा परब्रह्म है, अतः आपमे कुछ भी अकल्पनीय या विरोध मुलक नहीं है। जैसा आपने कहा है, प्रकृति आपकी अध्यक्षता में उसी तरह कार्य करती है, जिस तरह कोई सरकारी अधिकारी मुख्य कार्यकारी के आदेशों पर काम करता है। अधीनस्थ कार्यकलापों का आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि आप परब्रह्म है और सारे नियम आप में अवस्थित हैं और प्रकृति के सारे कार्यकलाप आपके द्वारा ही संचालित होते हैं अतः इनमें से कोई कार्यकलाप आप पर प्रभाव नहीं डालता।

आप शुक्लम कहलाते हैं शुक्लम अर्थात् धवल परम सत्य का प्रतीकात्मक निरूपण है क्योंकि भौतिक गुणों से यह अप्रभावित रहता है। ब्रह्माजी रक्त अथवा लाल कहलाते हैं, क्योंकि सृजन के लिए वे रजोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं। तमस शिवजी के जिम्मे में पड़ा है, क्योंकि वे संपूर्ण सृष्टि का संहार करते हैं। इस दृश्य जगत का सृजन, सहार तथा पालन आपकी शक्तियों द्वारा संपन्न होता है, तो भी आप इन गुणों से अप्रभावित रहते हैं। जैसा कि वेदों द्वारा पुष्ट किया गया है- हरि ही निर्गुण: साक्षात्- श्री भगवान सदैव ही समस्त भौतिक गुणों से मुक्त होते हैं। यह भी कहा जाता है कि परमेश्वर में रजो तथा तमो गुणों का अभाव रहता है।

"हे प्रभु! आप परम नियंता,भगवान तथा इस दृश्य जगत की व्यवस्था को बनाए रखने वाले हैं। आपके अवतार का कारण संसार के उन आसुरी शासकों के अनुयायियों का वध करना है, जो राजकुमारों के वेश में रहते हुए वस्तुतः असुर हैं। मुझे विश्वास है कि आप उन सबों को उनके अनुयायियों तथा सैनिकों समेत मार डालेंगे।

"मुझे विदित है कि आप दुष्ट कंस तथा उसके अनुयायियों का वध करने के लिए अवतरित हुए हैं। किंतु यह जानकर कि आप उसे तथा उसके अनुयायियों का वध करने के लिए अवतरित होंगे, उसने आपके कई पूर्वजों या अग्रजो को मार डाला है। अब वह केवल आपके जन्म की प्रतीक्षा में हैं। जैसे ही वह इसे सुनेगा, वह आप को मारने के लिए सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर उपस्थित होगा।"

वसुदेव की इस प्रार्थना के बाद कृष्ण की माता देवकी ने प्रार्थना की। वे अपने भाई के अत्याचारों से अत्यंत भयभीत थी। "देवकी ने कहा," हे प्रभु! वैदिक साहित्य में आपके अनेक शाश्वत अवतारों का मूल अवतारों के तौर पर वर्णन हुआ है, यथा नारायण, राम, हयशीर्ष, वराह, नरसिंह, वामन, बलदेव विष्णु से उद्धत ऐसे लाखों अवतार। आप मूल अवतार हैं क्योंकि आपकी अवतारों के सभी रूप इस भौतिक सृष्टि से बाहर हैं। आपका स्वरूप इस दृश्य जगत की उत्पत्ति के पहले से उपस्थित था। आपके स्वरूप शाश्वत तथा सर्व व्यापी हैं। वे स्वयं तेजोमय, अपरिवर्तनीय तथा भौतिक गुणों से कलुषित है। ऐसे शाश्वत रूप नित्य, ज्ञानमय तथा आनंदमय है। वे सभी दिव्य सात्विकता से पूर्ण तथा विभिन्न लीलाओं में सदैव निरत रहने वाले हैं। आपका कोई एक ही विशेष रूप नहीं होता। ऐसे अनेक दिव्य रूप स्वतंत्र हैं। मैं जानती हूं कि आप परमेश्वर विष्णु है।

"लाखों वर्षों बाद जब ब्रह्मा के जीवन का अंत होता है, तू दृश्य जगत का विलय हो जाता है। उस समय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश यह पांच तत्व महत् त्व में प्रवेश कर जाते हैं। यह महत् तत्व कालवश अप्रकट समग्र भौतिक शक्ति में प्रवेश करता है, समग्र भौतिक शक्ति प्रधान में और प्रधान आप में प्रवेश करता है। संपूर्ण दृश्य जगत के संहार के पश्चात केवल आपका दिव्य नाम, रूप, गुण तथा साज सामान ही शेष रह जाते हैं।

"हे प्रभु! मैं आपको सादर नमस्कार करती हूं, क्योंकि आप अव्यक्त समग्र शक्ति के निदेशक और भौतिक प्रकृति के परम आगार हैं। हे स्वामी! सारा दृश्य जगत, वर्ष के अथ से इती तक कालाधीन है। सभी आप के निर्देशन में कार्य करते हैं। आप हर वस्तु के मूल निदेशक तथा समस्त प्रबल शक्तियों के आगार हैं।

"अत: आप से मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे उग्रसेन के पुत्र कंस के क्रूर हाथों से बचाएं। कृपा करके मुझे इस भयावह स्थिति से उबारे क्योंकि आप अपने सेवकों की रक्षा करने के लिए सदैव उद्धत रहते हैं।" भगवान ने इस कथन की पुष्टि भगवत गीता में अर्जुन को आश्वस्त करते हुए की है, " तुम संसार को बता दो कि मेरा वक्त कभी नष्ट नहीं होता।"

इस प्रकार रक्षा करने के लिए प्रार्थना करते हुए माता देवकी ने अपना वात्सल्य व्यक्त किया: " मुझे ज्ञात है कि आपके इस दिव्य स्वरूप का दर्शन सामान्यतया ऋषि गण ध्यान में करते हैं, किंतु मैं अभी भी डर रही हूं कि ज्योही कंस को पता चल जाएगा कि आपका जन्म हो चुका है, तो वह आपको हानि पहुंचा सकता है। अतः मेरी प्रार्थना है कि आप इस समय हमारे भौतिक चक्षुओं से ओझल हो जाएं।" दूसरे शब्दों में, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे एक सामान्य बालक का रूप धारण कर ले। "आपके जन्म के कारण ही में अपने भाई कंस से भयभीत हूं। हे मधुसूदन! हो सकता है कि कंस को पता न लगे कि आपने जन्म धारण कर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि आप अपने इस चतुर्भुज रूप को जिसमें आप विष्णु के चार चिन्ह शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किए हैं, छुपा ले। हे प्रभु! आप दृश्य जगत के प्रलय के अंत में सारे ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करते हैं फिर भी आप अपनी विशुद्ध कृपा वश मेरे गर्भ में प्रकट हुए हैं। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए सामान्य मनुष्य के कार्यकलापों का अनुकरण करते हैं।"

देवकी की प्रार्थना सुनकर भगवान ने उत्तर दिया,"हे माता! स्वयंभू मनु के कल्प में मेरे पिता वसुदेव एक प्रजापति के रूप में थे जिसका नाम सुतपा था और आप उनकी पत्नी पृश्नि थी। उस समय ब्रह्मा ने प्रजा बढ़ाने की इच्छा से आपसे संतान उत्पन्न करने के लिए कहा। आपने अपनी इंद्रियों को वश में करते हुए कठोर तपस्या की। योग पद्धति में प्राणायाम का अभ्यास करते हुए आप पति-पत्नी दोनों ने वर्षा, वायु, कड़कती धूप जैसे भौतिक नियमों के सारे प्रभावों को सहन किया। आपने समस्त धार्मिक नियमों का पालन किया। इस प्रकार आपका हृदय निर्मल हो गया और भौतिक नियम के प्रभावों पर भी नियंत्रण प्राप्त हो गया। तपस्या करते हुए आप वृक्षों के नीचे भूमि पर गिरी हुई पत्तियों मात्र का आहार करती रही। तब स्थिर मन तथा इंद्रिय निग्रह द्वारा आपने मुझसे अद्भुत वर प्राप्त करने के लिए मेरी पूजा की। आप दोनों ने देवताओं की गणना के अनुसार 12000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उस अवधि में आपका मन मुझ में ही लीन रहा। जब आप भक्ति कर रही थी और अपने मन में निरंतर मेरा ध्यान कर रही थी, तब मैं आपसे अत्यधिक प्रसन्न हुआ। हे निष्पाप माता! अतः आप का अंत: करण नित्य ही विशुद्ध है। उस समय भी मैं आपके समक्ष इसी रूप में आपकी इच्छा पूर्ति के लिए प्रकट हुआ था और आपसे मन वांछित वर मांगने के लिए कहा था। उस समय आप ने चाहा था कि मैं आपके पुत्र रूप में जन्म लूँ। यद्यपिआपने मेरा साक्षात दर्शन किया था, तथापि आपने मेरी माया के प्रभाव के कारण व्यापक भव बंधन से पूर्ण मुक्ति ना मांग कर मुझे अपने पुत्र के रूप में मांगा था।"

दूसरे शब्दों में,भगवान ने प्रकट होने के लिए इस जगत में पृश्नि तथा सुतपा के अपने माता पिता के रूप में चुना। जब भी भगवान मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं, उन्हें अपने माता-पिता की आवश्यकता होती है; फलत: उन्होंने पृश्नि तथा सुतपा को शाश्वत माता पिता के रूप में चुना; इसलिए पृश्नि तथा सुतपा दोनों ही मुक्ति की याचना ना कर सके। मुक्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितनी कि भगवान की दिव्य प्रेमा-भक्ति होती है। भगवान चाहते तो पृश्नि तथा सुतपा को तुरंत मुक्ति प्रदान कर सकते थे,किंतु अपनी विभिन्न अवतारों के लिए उन्हें इसी भौतिक जगत में बनाए रखना श्रेयस्कर समझा, जैसा कि आगे वर्णन किया जाएगा। भगवान से उनके माता-पिता बनने का वर प्राप्त करके पृश्नि तथा सुतपा दोनों तपस्या छोड़कर घर चले आए और पति-पत्नी के रूप में रहने लगे जिससे वे साक्षात परमेश्वर को पुत्र रूप में उत्पन्न कर सकें।

कालक्रम से पृश्निगर्भवती हुई और एक शिशु को जन्म दिया। भगवान ने वसुदेव तथा देवकी से कहा : "उस समय मेरा नाम पृश्निगर्भ था। अगले कल्प में आपने अदिति तथा कश्यप के रूप में जन्म लिया और तब मैं उपेंद्र नाम से आपका पुत्र बना। उस समय मेरा स्वरूप एक बौने जैसे था जिसमें में वामन देव के नाम से विख्यात हुआ। मैंने आपको वर दिया था कि मैं तीन बार आपके पुत्र रूप में जन्म धारण करूंगा। पहली बार मैं पृश्नि तथा सुतपा से जन्म लेकर पृश्निगर्भ कहलाया, दूसरी बार आदित्य तथा कश्यप से जन्म लेकर उपेंद्र कहलाया और तीसरी बार में देवकी तथा वसुदेव से कृष्ण नाम से उत्पन्न हुआ हूं। मैं इस विष्णु रूप में इसलिए अवतरित हुआ हूं कि आपको विश्वास दिला सकूं कि उसे श्री भगवान ने पुनः जन्म धारण किया है। मैं चाहता तो एक सामान्य शिशु के रूप में प्रकट हो सकता था, किंतु तब आपको विश्वास नहीं होता कि आप के गर्भ से मुझ भगवान ने ही जन्म लिया है। हे मेरे माता पिता! इस तरह आपने कई बार अत्यंत लाड-प्यार से अपने पुत्र के रूप में मुझे पाला-पोसा है, अतः मैं अत्यधिक प्रसन्न हूं और आपका अत्यंत कृतज्ञ हूं। मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस बार आप अपने उद्देश्य को पूरा करके भगवत धाम को वापस जाएंगे। मैं मानता हूं कि आप मेरे लिए चिंतित हैं और कंस से भयभीत हैं, अतः मेरा आदेश है कि आप तुरंत ही मुझे गोकुल ले चले और यशोदा की नवजात कन्या से जो अभी-अभी उत्पन्न हुई है, मुझे बदल दें।"

अपने माता पिता को इस प्रकार कहकर उनकी उपस्थिति में भगवान सामान्य बालक बन गए और मौन हो गए।

भगवान का आदेश पाकर वसुदेव अपने पुत्र को प्रसूति गृह से बाहर ले जाने के लिए तैयार हो गए। ठीक उसी समय नंद तथा यशोदा के एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वह योग माया थी, अर्थात वह भगवान की अंतरंगा आ सकती थी। इस योग माया के प्रभाव से कंस के महल के सारे निवासी और विशेष रूप से द्वारपाल गहरी नींद में सो गए और लोह श्रृंखलाओं से बंद महल के सारे दरवाजे खुल गए। रात अत्यंत अंधेरी थी, किंतु जो ही वसुदेव कृष्ण को अपनी गोद में लेकर बाहर निकले, तो उन्हें सबकुछ दिखने लगा मानो सूर्य का प्रकाश हो।

चैतन्यचरितामृत में कहा गया है कि कृष्ण सूर्य प्रकाश के तुल्य हैं और जहां भी कृष्ण रहते हैं वहां अंधकार रूपी माया नहीं रह सकती। जब कृष्ण को वसुदेव ले जा रहे थे, तब रात्रि का अंधकार दूर हो गया। कारागार के सारे द्वार स्वत: खुल गए। साथ ही आकाश में गंभीर गर्जना हुई और भीषण वृष्टि होने लगी। जब वसुदेव इस वर्षा में अपने पुत्र को ले जा रहे थे,तो भगवान शेष ने नाक का रूप धारण करके वसुदेव के सिर के ऊपर अपने फन फैला दिए जिससे वृष्टि से उन्हें बाधा ना पहुंची। वसुदेव यमुना के तट पर आए, तो देखा कि यमुना के जल में गरजती लहरें उठ रही है और सारा पाट फेनिल हो उठा है। इतने पर भी यमुना ने वसुदेव को नदी को पार करने के लिए मार्ग दे दिया, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सेतुबंध के समय हिंद महासागर ने भगवान रामचंद्र को रास्ता दे दिया था। इस प्रकार वसुदेव ने यमुना पार की। उस पार वे नंद महाराज के गोकुल स्थित निवास स्थान में गए जहां उन्होंने देखा कि सारे ग्वाले गहरी नींद में सोए हुए थे। इस अवसर का लाभ उठाकर वे यशोदा के घर में चुपके से घुस गए और बिना किसी कठिनाई के अपने पुत्र को रखकर बदले में यशोदा की नवजात पुत्री को उठा लाए। इस प्रकार चुपके से घर में घुसकर लड़के को लड़की से बदलकर वे पुनः कंस के कारागार में लौट आए तथा पुत्री को देवकी की गोद में रख दिया। उन्होंने पुनः हथकड़ी-बेड़ियां पहन ली जिससे कंस को यह पता ना चले की इतनी सारी घटनाएं घट चुकी है।

माता यशोदा समझती थी कि उनके एक शिशु उत्पन्न हुआ है, किंतु प्रसव पीड़ा से थक जाने के कारण वे प्रगाढ़ निद्रा में थी। जब वे जागीं, तो उन्हें याद ना रहा कि उनके पुत्र हुआ है या पुत्री।

इस प्रकार भगवान कृष्ण का जन्म हुआ।

Saturday, May 23, 2020

देवताओं द्वारा गर्भस्थ भगवान् कृष्ण की स्तुति [2]

यह भौतिक जगत पांच प्रमुख तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश- से बना हुआ है और यह सारे तत्व कृष्ण से ही उदित है। भौतिक विज्ञानी इन पांच मूल तत्वों को भौतिक सृष्टि का कारण मानते हैं, किंतु यह सारे तत्व अपनी स्थूल तथा सूक्ष्म अवस्थाओं में कृष्ण द्वारा ही उत्पन्न है। इस भौतिक जगत में कार्यरत समस्त जीव भी उनकी तटस्था तथा शक्ति के प्रतिफल हैं। भगवत गीता के सातवें अध्याय में स्पष्ट कहा गया है कि यह सारा संसार कृष्ण की परा तथा अपरा नामक दो प्रकार की शक्तियों का संयोग है। जीवात्माऐंँ भगवान की परा शक्ति है और निर्जीव भौतिक तत्व अपरा शक्ति है। सुप्ता अवस्था में प्रत्येक वस्तु कृष्ण में समाहित रहती है।

देवता गण भौतिक प्राकृतिक के विश्लेषण- अध्ययन द्वारा भगवान के परम रूप की सादर प्रार्थना करते रहे। यह भौतिक प्राकृतिक क्या है? यह एक वृक्ष के समान है। वृक्ष भूमि पर खड़ा रहता है। इसी तरह भौतिक प्राकट्य रूपी यह वृक्ष प्रकृति रूपी भूमि पर खड़ा है। इस भौतिक प्राकट्य की तुलना वृक्ष से की जाती है, क्योंकि समय आने पर वृक्ष को काट लिया जाता है। वृक्ष का अर्थ है, वह जो अनंत काट लिया जाएगा। अतः भौतिक प्राकट्य का यह वृक्ष परम सत्य नहीं माना जा सकता क्योंकि इस पर काल का प्रभाव पड़ता है, किंतु कृष्ण का शरीर शाश्वत है। वे भौतिक प्राकट्य के पहले भी विद्यमान थे, भौतिक जगत के अस्तित्व में होने पर भी विद्यमान हैं और जब इसका विलय हो जाएगा तब भी वे विद्यमान रहेंगे। अतः केवल कृष्ण को ही परम सत्य माना जा सकता है।

कठोपनिषद में भी प्रकृति रूपी भूमि पर खड़े हुए भौतिक जगत रूपी वृक्ष का उदाहरण मिलता है। इसमें दो प्रकार के फल होते हैं- सुख तथा दुख। इस शरीर रूपी वृक्ष में रहने वाले प्राणी दो पक्षियों के समान होते हैं। एक पक्षी कृष्ण का अंतर्यामी स्वरूप है, जो परमात्मा कहलाता है और दूसरा पक्षी जीव है। जीव इस भौतिक जगत के फलों को खा रहा है। कभी यह सुख का फल खाता है, तो कभी दुख का फल। किंतु दूसरा पक्षी सुख या दुख के फलों को खाने में रुचि नहीं लेता, क्योंकि वह आत्म- तुष्ट है। कठोपनिषद में कहा गया है कि इस शरीर रूपी वृक्ष का एक पक्षी फल खा रहा है और दूसरा केवल साक्षी रूप में देख रहा है। इस वृक्ष की जड़ें तीन दिशाओं में फैली है। इसका अर्थ यह हुआ कि वृक्ष की यह जड़े प्रकृति के तीन गुण सतो, रजो तथा तमोगुण। जिस प्रकार वृक्ष की जड़े फैलती हैं उसी प्रकार प्रकृति के गुणों के संसर्ग से मनुष्य अपने जीवन अवधि बढ़ाता है। इन फलों का स्वाद चार प्रकार का है- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। प्रकृति के तीन गुणों के साथ विभिन्न प्रकार के संसर्ग उनके फल स्वरूप जीव विभिन्न प्रकार के धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का स्वाद लेता है। व्यवहारिक रूप में सारा भौतिक कार्य अज्ञान में किया जाता है, किंतु तीन प्रकार के गुण होने से कभी-कभी यह अज्ञान सतो या रजोगुण से आच्छादित रहता है। इन भौतिक फलों का स्वाद पांच इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया जाता है। पांच इंद्रियां, जिनके द्वारा ज्ञान अर्जित किया जाता है, छह प्रकार के दोषों से प्रभावित होती है- शोक, मोह, दुर्बलता, मृत्यु, भूख तथा प्यास। यह भौतिक शरीर या भौतिक जगत सात कोशो से ढका है- त्वचा, पेशी, मांस, मज्जा, अस्थि, वसा तथा वीर्य। वृक्ष की आठ शाखाएं हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु शून्य, मन, बुद्धि तथा अहंकार। इस शरीर में नौ द्वार हैं-दो आंखें, दो नथुने, दो कान, एक मुँह, एक शिश्न, एक गुदा। और इस शरीर के भीतर दस प्रकार के आंतरिक वायु हैं- प्राण, आपान, उदान, व्यान, समान इत्यादि। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इस वृक्ष पर बैठे दो पक्षी जीव आत्मा तथा अंतर्यामी भगवान है।

यहां पर वर्णित भौतिक जगत के मूल कारण भगवान ही हैं। वे अपना विस्तार करते हैं और भौतिक जगत के तीन गुणों को अपने अधिकार में करते हैं। विष्णु सतोगुण को संभालते हैं, ब्रह्मा रजोगुण को शिवजी तमोगुण का भार ग्रहण करते हैं। ब्रह्मा रजोगुण के इस सृष्टि को उत्पन्न करते हैं,विष्णु सतोगुण से इसका पालन करते हैं और शिवजी तमोगुण से किसका संहार करते हैं। संपूर्ण सृष्टि परमेश्वर पर आश्रित है। वे हीं इसकी उत्पत्ति, पालन तथा संहार के कारण है। और जब इस संपूर्ण सृष्टि का विलय हो जाता है, तो भगवान की शक्ति के रूप में यह सूक्ष्म सृष्टि भगवान के शरीर के भीतर स्थित रहती है।

देवताओं ने स्तुति की,"इस समय परमेश्वर कृष्ण इस जगत के पालन हेतु जन्म ले रहे हैं।" वास्तव में परम कारण एक ही है, किंतु प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा भ्रमित हो जाने के कारण अल्प ज्ञानी व्यक्ति समझते हैं कि यह जगह विभिन्न कारणों से प्रकट हो रहा है। जो बुद्धिमान है, वे देख सकते हैं कि इसका कारण एक, कृष्ण है। जैसा ब्रह्म- संहिता में कहा गया है- ईश्वर: परम: कृष्ण:.... सर्व-कारण-कारणम्। "भगवान कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं।" ब्रह्मा सृष्टि के लिए नियुक्त किए गए एजेंट हैं, विष्णु पालन के लिए कृष्ण के अंश है और शिवजी विलय के लिए कृष्ण के अंश हैं।

देवताओं ने स्तुति की, "हे स्वामी! आपके शाश्वत रूप को समझ पाना दुष्कर है। सामान्य जन आपके वास्तविक रूप को समझने में अक्षम रहते हैं, अत: आप अपना आदि शाश्वत रूप प्रकट करने के लिए स्वयं अवतार ले रहे हैं। लोग किसी तरह आप के विभिन्न अवतारों को तो समझ सकते हैं, किंतु दो भुजाओं वाले कृष्ण के शाश्वत रूप को,मनुष्य के बीच उन्हीं के समान विचरण करते देखकर वह उलझन में पड़ जाते हैं।आपका यह शाश्वत रूप भक्तों के दिव्य आनंद को बढ़ाता रहता है, किंतु अब भक्तों के लिए यह घातक है।" जैसा कि भगवत गीता में कहा गया है कृष्ण साधु के लिए अत्यंत मोहक है। परित्राणाय साधुनाम । किंतु यह रूप असुरों के लिए अत्यंत घातक है,क्योंकि कृष्ण असुरों के वध के लिए अवतरित होते हैं। अतः वे एक ही साथ भक्तों के लिए मोहक और असुरों के लिए घातक हैं।

"हे कमल के समान नेत्रों वाले प्रभु! आप शुद्ध सत्व के स्रोत हैं। ऐसी अनेक ऋषि हैं जिन्होंने केवल समाधि के द्वारा या आपके चरण कमलों के आध्यात्मिक ध्यान के द्वारा और इस तरह आपके विचार में लीन रहकर प्रकृति द्वारा उत्पन्न अज्ञान के महासागर को गोखुर में समाने वाले जल के समान बना दिया है। ध्यान का उद्देश्य मन को भगवान के चरण कमलों से प्रारंभ करके उन पर केंद्रित करना है। भगवान के चरण कमलों के ध्यान से ही बड़े-बड़े मुनि इस विशाल भवसागर को बिना कठिनाई के पार कर लेते हैं।

"हे स्वयं प्रकाशित! जिन महान संतों ने आपके चरण कमलों की दिव्य नाव के सहारे अज्ञान सागर को पार कर लिया है वे उस नाव को अपने साथ नहीं ले गए। वह अब भी इस बार पढ़ी हुई है।" यदि कोई नाव द्वारा नदी पार करता है, तो वह नाव को भी उस पार ले जाता है। अतः जब वह अपने गंतव्य पर पहुंच जाता है, तो फिर वही नाव किस प्रकार उन लोगों के लिए उपलब्ध हो सकती है, जो इस और प्रतीक्षा कर रहे हैं? इस कठिनाई का उत्तर देने के लिए देवता अपने स्तुति में कहते हैं कि भगवान के चरण कमलों की यह नाव ले नहीं जाई जाती। जो भक्तगण अब भी भवसागर के इस पार खड़े हैं वह दूसरी ओर जाने में समर्थ होते हैं, क्योंकि शुद्ध भक्त सागर को पार करते समय उसे अपने साथ नहीं ले जाते। जो कोई इस नाव के पास जाता है, तो भौतिक ज्ञान का सारा समुद्र सिमटकर गोपद में समा जाता है। अतः:भक्तों को दूसरी ओर जाने के लिए नाव की आवश्यकता ही नहीं पड़ती; वे तुरंत समुद्र पार कर लेते हैं। क्योंकि महान साधु पुरुष समस्त जीवों के प्रति दयालु होते हैं, नाव तब भी इस ओर पड़ी रहती है। कोई किसी समय उनके चरणारविंदो का ध्यान करके भौतिक अज्ञान के महासागर को पार कर सकता है।

ध्यान का अर्थ है भगवान के चरण कमलों पर एकाग्रता। चरण कमल भगवान के सूचक हैं। किंतु जो निर्विशेषवादी है, वे भगवान के चरण कमलों को नहीं मानते, उनके ध्यान का विषय निराकार होता है। देवताओं का यह पक्का निर्णय है कि जो लोग शून्य या निराकार का ध्यान करने में रुचि रखते हैं, वे अज्ञान के सागर को पार नहीं कर सकते। ऐसे लोग केवल यही सोचते हैं कि वह मुक्त हो गए हैं। "हे कमल नेत्र प्रभु! उनकी बुद्धि कलमषग्रस्त हो जाती है क्योंकि वे आपके चरण कमलों का ध्यान करने में असफल रहते हैं।" इस उपेक्षा-भाव के कारण निर्विशेषवादी संसार के बध्द जीवन में पुनः आ गिरते हैं, भले ही कुछ काल के लिए वे निराकार साक्षात्कार के पद तक पहुंच जाए। निर्विशेषवादी ब्रह्म तेज मैं लीन होने के लिए कठिन तपस्या करते हैं, किंतु उनके मन भौतिक कल्मष से मुक्त नहीं होते, गई चिंतन की भौतिक विधियों का निषेध मात्र करते रहते हैं। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं कि वे मुक्त हो चुके हैं। इस तरह भी नीचे गिर जाते हैं।

भगवत गीता में कहा गया है कि निर्विशेषवादीयो को चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महान यातनाएं सहन करनी पड़ती है। श्रीमद्भागवत के प्रारंभ में इसका भी उल्लेख है कि भगवान की भक्ति के बिना किसी को सकाम कर्मों के बंधन से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। भागवत गीता में भगवान कृष्ण का श्रीमद् भागवत में नारद मुनि का कथन है और यहां भी देवता इसकी पुष्टि करते हैं,"जो लोग भक्ति नहीं करते उन्हें ज्ञान का चरम लक्ष्य ज्ञात नहीं रहता। ऐसे लोगों को आपकी कृपा प्राप्त नहीं होती।" निर्विशेषवादी केवल यही सोचते हैं कि वे मुक्त हैं, किंतु वास्तव में उनमें भगवान के लिए कोई भावना नहीं होती। वे सोचते हैं कि जब कृष्ण इस जगत में आते हैं, तो भी भौतिक शरीर धारण करते हैं। इस प्रकार वे श्री कृष्ण के दिव्य शरीर की उपेक्षा कर देते हैं। भगवत गीता में इसकी पुष्टि हुई है- अवजानन्ति मां मूढा:। फलत: निर्विशेषवादी भौतिक वासना पर विजय पाने तथा मुक्ति तक पहुंचने के बावजूद नीचे गिर जाते हैं। यदि वे ज्ञान के लिए ही वस्तुओं को जानने में व्यस्त रहते हैं और भगवान की भक्ति नहीं करते, तू उन्हें वांछित फल प्राप्त नहीं हो सकता। उनकी हाथ लगता है केवल उनके द्वारा उठाया गया कष्ट, इससे अधिक कुछ नहीं।

देवताओं द्वारा गर्भस्थ भगवान् कृष्ण की स्तुति [1]

राजा कंस ने न केवल यदु, भोज तथा अंधक वंशो के राज्यों तथा शूरसेन के राज्य को अपने अधिकार में कर लिया, अपितु उसने अन्य सभी आसुरी राजाओं से मैत्री भी स्थापित की। उनके नाम हैं -प्रलम्ब, बक, चाणूर, अघासुर, मुष्टिक, अरिष्ट, पूतना, केशी तथा धेनुक। उस समय जरासंध मगध प्रांत का राजा था। इस तरह, कूटनीति से कंस ने जरासंध के संरक्षण में उस समय का सबसे शक्तिशाली राज्य सुगठित कर लिया। उसने बाणासुर तथा भोमासूर जैसे राजाओं से भी मैत्री स्थापित कर ली जब तक कि वह सर्वाधिक प्रबल नहीं बन गया। फिर वह यदुवंश के प्रति, जिसमें कृष्ण को जन्म लेना था, अत्यधिक शत्रुता बरतने लगा।

कंस के द्वारा सताये जाने के कारण यदु, भोज तथा अंधक राजा अन्य राज्यों यथा कुरु, पंचाल केकय, शाल्व, विदर्भ निषध विदेह तथा कौशल राज्य की शरण में जाने लगे- कंस ने यदु राज्य तथा उसी के साथ भोज तथा अन्धक राज्यों की एकता को ध्वस्त कर दिया। उसने उस समय भारतवर्ष नाम से विख्यात विशाल भूभाग में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली।

जब कंस ने एक-एक करके देव की कथा वसुदेव के 6 शिशुओं का वध कर दिया, तो कंस के अनेक मित्र तथा परिजन उसके पास पहुंचे और उन्होंने प्रार्थना की कि वह इस जघन्य ने कर्म को त्याग दें। किंतु बाद में वे सब कंस के प्रशंसक बन गए।

जब देवकी सातवीं बार गर्भवती हुई, तो उनके गर्भ में अनंत नामक कृष्ण का पूर्ण अंश प्रकट हुआ। देवकी हर्ष तथा विषाद से अभिभूत थी। वे हर्षित थी, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके गर्भ में भगवान विष्णु ने आश्रय लिया है, किंतु साथ ही वे खिन्न थी, कि शिशु के उत्पन्न होते ही कंस उसका वध कर देगा। उस समय भगवान श्री कृष्ण ने कंस के द्वारा किए गए अत्याचारों से यदुओ की भयभीत स्थिति पर दयालु होकर अपनी अंतरंगा शक्ति योग माया को प्रकट होने का आदेश दिया। कृष्ण संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी है, किंतु यदुवंश के वे विशेष रूप से स्वामी है।

योग माया भगवान की प्रमुख शक्ति है। वेदों में कहा गया है कि श्री भगवान की अनेक शक्तियां हैं। यह विभिन्न शक्तियां बाहर तथा भीतर से कार्य कर रही हैं और योग माया समस्त शक्तियों में प्रमुख है। उन्होंने आदेश दिया कि योग माया ब्रज भूमि वृंदावन में अवतरित हो, जो सदैव सुंदर गोओ से पूरित तथा सुशोभित रहता है। वसुदेव की एक पत्नी रोहिणी वृंदावन में राज नंद तथा रानी यशोदा के घर में निवास कर रही थी। कंस के अत्याचारों से भयभीत होकर न केवल रोहिणी, अपितु अन्य अनेक यदुवंशी सारे देश में बिखर चुके थे। कुछ तो पर्वतों की गुफाओं में रह रहे थे।

अत: भगवान कृष्ण योग माया से इस प्रकार बोले," देव की कथा वसुदेव कंस के कारागार में बंदी है और इस समय मेरा पूर्ण अंश, शेष, देवकी के गर्भ में है। तुम शेष को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर सकती हो। इस व्यवस्था के बाद में अपनी समस्त शक्तियों के सहित स्वयं देवकी के गर्भ में अवतरित होने जा रहा हूं। फिर मैं देव की कथा वसुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हूंगा। तब तुम वृंदावन में नंद यशोदा की पुत्री के रूप में प्रकट होना।

"क्योंकि तुम मेरी सह भगिनी के रूप में जन्मोगी, और क्योंकि तुम शीघ्र इंद्रिय तृप्ति की इच्छाओं की पूर्ति करोगी। अत: संसार के सभी लोग सभी प्रकार की मूल्यवान भेटो यथा- अ गुरु, बत्ती, पुष्प तथा यज्ञ की हवि- तुम्हारी पूजा करेंगे। जिन लोगों को भौतिकता से प्रेम है वे तुम्हारी अंश के विभिन्न रूपों में, जो दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चंडीका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, इशानी, शारदा तथा अंबिका नाम से अभिहित होंगे, तुम्हारी पूजा करेंगे।"

कृष्ण कथा योग माया भाई तथा बहन- परम शक्तिमान तथा परम शक्ति के रूप में प्रकट हुए। यद्यपि शक्तिमान तथा शक्ति में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है, तथापि शक्ति सदैव ही शक्तिमान के अधीन रहती है। जो लोग भौतिकवादी है, वे शक्ति के उपासक हैं, किंतु जो अध्यात्म वादी हैं, वे शक्तिमान के पूजक हैं। कृष्ण परम शक्तिमान है और भौतिक जगत में दुर्गा परम शक्ति है। वास्तव में वैदिक संस्कृति में लोग शक्तिमान तथा शक्ति दोनों की एक साथ पूजा करते हैं। विष्णु तथा देवी के ऐसे लाखों मंदिर होंगे और कहीं-कहीं तो इन दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। शक्ति दुर्गा अथवा कृष्ण की बहिरंगा शक्ति के उपासकों को सरलता पूर्वक सभी प्रकार की भौतिक सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं, किंतु यदि कोई आध्यात्मिक दृष्टि से ऊपर उठना चाहता है, तो उसे कृष्ण चेतना के अनुसार शक्तिमान की पूजा करनी चाहिए।

भगवान ने योग माया से यह भी घोषित कर दिया कि उनका पूर्णांश 'अनंत या शेष' देवकी के गर्भ में स्थित है। रोहिणी के गर्भ में बलपूर्वक ले जाए जाने के कारण वे संकर्षण कहलाएंगे और वे समस्त देवी शक्तियां बल के स्रोत होंगे जिसके द्वारा लोग जीवन का सर्वोच्च आनंद, जिसे रमण कहते हैं, प्राप्त कर सकेंगे। अत: पूर्णांश अनंत अपने अवतार के पश्चात संकर्षण या बलराम नाम से प्रसिद्ध होंगे।

कोई परमेश्वर या किसी प्रकार के आत्म साक्षात्कार के परम स्तर को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक बलराम की पर्याप्त कृपा ना हो। बल का अर्थ शारीरिक शक्ति नहीं है। न हीं शारीरिक शक्ति से किसी को आध्यात्मिक सिद्धि मिल सकती है। उसमें आध्यात्मिक शक्ति होनी चाहिए, जो बलराम या संकर्षण द्वारा प्रदत की जाती है। अनंत या शेष शक्ति का स्रोत है, जो समस्त लोकों को उनकी विविध स्थितियों में धारण किए रहती है। भौतिक रूप से धारण करने की यह शक्ति गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहलाती है, किंतु वास्तव में यह संकर्षण शक्ति का ही प्रदर्शन है। बलराम या संकर्षण आध्यात्मिक शक्तियां आदि गुरु है। अत: भगवान नित्यानंद प्रभु, जो बलराम के अवतार भी हैं ,आदि गुरु हैं और गुरु भगवान बलराम का प्रतिनिधि होता है, जो आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। चैतन्यचरितामृत में इसकी पुष्टि की गई है कि गुरु कृष्ण की कृपा का प्राकट्य है।

जब भगवान ने योग माया को इस तरह आदेश दिया, तो उसने उनकी प्रदक्षिणा की तब उनकी आज्ञा अनुसार वह इस भौतिक जगत में प्रकट हुई। जब भगवान की परम शक्ति योग माया ने शेष को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किया, तो वे दोनों ही योग माया के वश में थी, जिसे योगनिद्रा कहते हैं। जब ऐसा हो चुका, तो लोगों ने समझा कि देवकी का सातवां गर्भ विनष्ट हो गया। इस तरह यद्यपि बलराम देवकी के पुत्र रूप में अवतरित हुए, किंतु रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किए जाने के कारण उनके पुत्र कहलाए। इस व्यवस्था के बाद, अपने निष्काम भक्तों की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पूर्ण अचिंत्य शक्तियों सहित संपूर्ण सृष्टि के स्वामी के रूप में वसुदेव के मन में प्रवेश किया। इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य हो कि भगवान कृष्ण पहले वसुदेव के निष्काम हृदय में प्रविष्ट हुए और तत्पश्चात देवकी के हृदय में स्थानांतरित हुए। वह देवकी के गर्भ में वीर्य द्वारा स्थापित नहीं हुए थे। भगवान अपनी अचिंत्य शक्ति से किसी रूप में प्रकट हो सकते हैं। उनके लिए यह अनिवार्य नहीं कि वह स्त्री के गर्भ में वीर्य-क्षेपण की सामान्य विधि द्वारा प्रकट हो।

जब वसुदेव भगवान को अपने हृदय में धारण किए हुए थे, तो वे उस देदीप्यमान सूर्य की भांति लग रहे थे जिसकी प्रखर किरणें सदा असहनीय होती है और सामान्य जनों को झुलसा ने वाली होती है। वसुदेव के शुद्ध निष्काम हृदय में स्थित भगवान का रूप कृष्ण के आदि रूप से भिन्न नहीं था। कहीं भी और विशेष रूप से हृदय के भीतर श्री कृष्ण के रूप का उदय धाम कहलाता है। धाम से कृष्ण के केवल रूप का नहीं, अपितु उनके नाम, गुण तथा साज-सामान का भी बोध होता है। यह सब एक साथ प्रकट होता है।

इस प्रकार भगवान का शाश्वत रूप अपनी पूर्ण शक्तियों समेत वसुदेव के मन से देवकी के मन में उसी तरह स्थानांतरित हुआ जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य की किरणें पूर्व में उदय होने वाले पूर्ण चंद्रमा में चली जाती है।

भगवान कृष्ण वसुदेव के शरीर से देवकी के शरीर में प्रविष्ट हुए। वे सामान्य जीव की परिस्थितियों से परे थे। चूँकि कृष्ण वहां थे,अत: यह समझना चाहिए कि उनके सारे पूर्ण अशं यथा नारायण तथा सभी अवतार,यथा नृसिंह, वराह इत्यादि उनके साथ साथ थे और उन पर भी इस जगत की परिस्थितियां काम नहीं कर रही थी। इस प्रकार देवकी उन भगवान का वास स्थान बन गई, जो अद्वितीय है और सारी सृष्टि के कारण हैं। यद्यपि देवकी परम सत्य का वास स्थान बन गई, किंतु कंस के घर के भीतर रहने के कारण वे शमित अग्नि या दूरूपयुक्त विद्या की भांति दिखाई पड़ती थी। जब अग्नि किसी पात्र में रखी जाती है या किसी घड़े में रखी जाती है, तो अग्नि की प्रकाशमान किरणें नहीं दिखती। इसी प्रकार से, वह दूरूपयुक्त ज्ञान, जिससे सामान्य जनता को लाभ नहीं पहुंचता, प्रशंसित नहीं होता। इसी प्रकार देवकी कंस के महल के कारागार की दीवारों के भीतर रखी गई थी जिससे कोई भी उनके उस दिव्य सौंदर्य को देख नहीं सकता था, जो उनके गर्भ में भगवान के आने से उत्पन्न हुआ था।

किंतु कंस ने अपनी बहन के इस दिव्य सौंदर्य को देखा और वह तुरंत इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भगवान ने उसके गर्भ में शरण ले ली है। इसके पहले वह इतनी अधिक सुंदर कभी नहीं लगी थी। वह स्पष्ट रूप से समझ गया कि देवकी के गर्भ में कोई कुतूहल पूर्ण वस्तु अवश्य है। अत: कंस विचलित हो गया। उसे विश्वास था कि भविष्य में उसका वध करने वाले भगवान का आगमन हो चुका है। कंस सोचने लगा: अब देवकी का क्या किया जाए? उसके गर्भ में निश्चित रूप से विष्णु या कृष्ण है, अत: यह निश्चित है की कृष्ण देवताओं का उद्देश्य पूरा करने के लिए आ गए हैं। यदि मैं तुरंत देवकी का वध भी कर दू, तो उनका उद्देश्य विफल नहीं हो सकता। "कंस भली भांति जानता था कि विष्णु के उद्देश्य को कोई विफल नहीं कर सकता। कोई भी बुद्धिमान पुरुष जान सकता है कि भगवान के नियमों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। सारे असुर चाहे कितनी ही विघ्न क्यों ना डालें, भगवान का उद्देश्य पूरा होकर रहेगा। कंस ने सोचा," यदि इस समय में देवकी को मारता हूं, तो विष्णु अपनी परम इच्छा को अधिक तीव्रता से लागू करेंगे। देवकी को इस समय मारना सबसे गणित कार्य होगा। भले कोई कितनी ही विषम परिस्थिति में क्यों ना हो, किंतु वह अपनी ख्याति नष्ट करना नहीं चाहता। यदि इस समय में देवकी को मारता हूं, तो मेरी ख्याति नष्ट हो जाएगी। आखिर, देवकी एक अबला है और वह मेरी शरण में है, वह गर्भवती है और यदि मैं उसे मारता हूं, तो मेरी ख्याति मेरे जीवन भर के पुण्य का फल तदा मेरे जीवन की अवधि है, समाप्त हो जाएगी।"

उसने आगे भी विचार किया," जो व्यक्ति अत्यधिक क्रूर होता है, वह इसी जीवन काल में मृततुल्य रहता है। क्रूर पुरुष अपने जीवन काल में किसी को प्रिय नहीं होता और उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे कोसते हैं। अपनी देहात्म बुद्धि के कारण मनुष्य का पतन होता है और नरक के अंतिम भाग में धकेल दिया जाता है।" कंस ने उस समय देवकी के वध के पक्ष और विपक्ष पर इस प्रकार से विचार किया। अंत में कंस ने देवकी को तुरंत ना मारकर अपरिहार्य भविष्य की प्रतीक्षा करने का निर्णय किया। किंतु उसका मन भगवान के प्रति शत्रुता से भर गया। वह धैर्य पूर्वक शिशु जन्म की प्रतीक्षा करने लगा, जिससे वह उनका वध कर सके जैसा कि उसने देवकी के अन्य बालकों के साथ किया था। इस प्रकार भगवान के प्रति शत्रुता के सागर में निमग्न वह बैठते, सोते, चलते, फिरते, खाते, काम करते- जीवन की सभी अवस्थाओं में- कृष्ण अथवा विष्णु के ही विषय में सोचने लगा। उनका मन भगवान के विचार में इतना लीन हो गया कि उसे अपने चारों ओर विष्णु या कृष्ण ही दिखते। दुर्भाग्यवश, यद्यपि उसका मन विष्णु के विचार में इतना लीन था, तथापि वह भक्त नहीं माना जाता, क्योंकि वह कृष्ण को शत्रु के रूप में सोचता था। महान भक्त के मन की दशा भी ऐसी ही होती है कि वह सदैव कृष्ण में लीन रहता है, किंतु भक्त भगवान के अनुकूल सोचता है, प्रतिकूल नहीं। कृष्ण के अनुकूल सोचना कृष्ण भक्ति है, किंतु कृष्ण के विपरीत सोचना कृष्ण भक्ति नहीं है।

उस समय ब्रह्मा तथा शिवजी नारद जैसे ऋषियों तथा अनेक देवताओं के साथ कंस के घर में अदृश्य रूप में प्रकट हुए। वे भक्तों को अत्यंत प्रिय एवं उनकी कामनाओं को पूर्ण करने वाली चुनी हुई स्तुतियों से भगवान की प्रार्थना करने लगे। उनके पहले शब्दों द्वारा यह घोषणा होती थी कि भगवान अपने प्रण के सच्चे होते हैं। जैसा की भागवत गीता में कहा गया है, श्री कृष्ण इस भौतिक जगत में पवित्र आत्माओं की रक्षा करने तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए अवतरित होते हैं। यही उनका प्रण है। देवता जान गए थे कि अपने प्रण को पूरा करने के लिए उन्होंने देवकी के गर्भ में वास किया है। देवता परम प्रसन्न थे कि भगवान अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए प्रकट हो रहे हैं, अत: उन्होंने उन्हें सत्यम परम कहकर संबोधित किया।

प्रत्येक व्यक्ति सत्य की खोज में लगा है। यही जीवन की दार्शनिक रीति है। देवता गण जानकारी देते हैं कि परम सत्य कृष्ण ही है। जो पूर्णत कृष्ण भावना भावित हो जाता है, वह परम सत्य को प्राप्त कर सकता है। कृष्ण की परम सत्य है। शाश्वत काल की तीन अवस्थाओं में सत्य है, सापेक्ष सत्य नहीं। काल भूत, वर्तमान तथा भविष्य में विभाजित है। भौतिक जगत में प्रत्येक वस्तु परम काल द्वारा- भूत, वर्तमान तथा भविष्य के द्वारा- नियंत्रित हो रही है; किंतु सृष्टि के पूर्व कृष्ण विद्यमान थे; सृष्टि के हो जाने पर प्रत्येक वस्तु कृष्ण पर आश्रित है और जब यह सृष्टि समाप्त होगी, तू कृष्ण बचे रहेंगे। अंत: वे सभी परिस्थितियों में परम सत्य हैं यदि भौतिक जगत में सत्य हैं, तो यह परम सत्य से उदित है। यदि इस भौतिक जगत में कहीं वैभव है, तो इसके स्रोत कृष्ण ही है। यदि संसार कुछ में ख्याति है, तो कृष्ण ही उसके कारण है। यदि संसार में कोई बल है, तू इस शक्ति के कारण कृष्ण हैं। यदि संसार में कोई ज्ञान तथा शिक्षा है, तो उसके कारण स्वरूप कृष्ण हैं। इस तरह कृष्ण सारे सत्यो के स्रोत हैं।
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