राजा कंस ने न केवल यदु, भोज तथा अंधक वंशो के राज्यों तथा शूरसेन के राज्य को अपने अधिकार में कर लिया, अपितु उसने अन्य सभी आसुरी राजाओं से मैत्री भी स्थापित की। उनके नाम हैं -प्रलम्ब, बक, चाणूर, अघासुर, मुष्टिक, अरिष्ट, पूतना, केशी तथा धेनुक। उस समय जरासंध मगध प्रांत का राजा था। इस तरह, कूटनीति से कंस ने जरासंध के संरक्षण में उस समय का सबसे शक्तिशाली राज्य सुगठित कर लिया। उसने बाणासुर तथा भोमासूर जैसे राजाओं से भी मैत्री स्थापित कर ली जब तक कि वह सर्वाधिक प्रबल नहीं बन गया। फिर वह यदुवंश के प्रति, जिसमें कृष्ण को जन्म लेना था, अत्यधिक शत्रुता बरतने लगा।
कंस के द्वारा सताये जाने के कारण यदु, भोज तथा अंधक राजा अन्य राज्यों यथा कुरु, पंचाल केकय, शाल्व, विदर्भ निषध विदेह तथा कौशल राज्य की शरण में जाने लगे- कंस ने यदु राज्य तथा उसी के साथ भोज तथा अन्धक राज्यों की एकता को ध्वस्त कर दिया। उसने उस समय भारतवर्ष नाम से विख्यात विशाल भूभाग में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली।
जब कंस ने एक-एक करके देव की कथा वसुदेव के 6 शिशुओं का वध कर दिया, तो कंस के अनेक मित्र तथा परिजन उसके पास पहुंचे और उन्होंने प्रार्थना की कि वह इस जघन्य ने कर्म को त्याग दें। किंतु बाद में वे सब कंस के प्रशंसक बन गए।
जब देवकी सातवीं बार गर्भवती हुई, तो उनके गर्भ में अनंत नामक कृष्ण का पूर्ण अंश प्रकट हुआ। देवकी हर्ष तथा विषाद से अभिभूत थी। वे हर्षित थी, क्योंकि उन्हें पता था कि उनके गर्भ में भगवान विष्णु ने आश्रय लिया है, किंतु साथ ही वे खिन्न थी, कि शिशु के उत्पन्न होते ही कंस उसका वध कर देगा। उस समय भगवान श्री कृष्ण ने कंस के द्वारा किए गए अत्याचारों से यदुओ की भयभीत स्थिति पर दयालु होकर अपनी अंतरंगा शक्ति योग माया को प्रकट होने का आदेश दिया। कृष्ण संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी है, किंतु यदुवंश के वे विशेष रूप से स्वामी है।
योग माया भगवान की प्रमुख शक्ति है। वेदों में कहा गया है कि श्री भगवान की अनेक शक्तियां हैं। यह विभिन्न शक्तियां बाहर तथा भीतर से कार्य कर रही हैं और योग माया समस्त शक्तियों में प्रमुख है। उन्होंने आदेश दिया कि योग माया ब्रज भूमि वृंदावन में अवतरित हो, जो सदैव सुंदर गोओ से पूरित तथा सुशोभित रहता है। वसुदेव की एक पत्नी रोहिणी वृंदावन में राज नंद तथा रानी यशोदा के घर में निवास कर रही थी। कंस के अत्याचारों से भयभीत होकर न केवल रोहिणी, अपितु अन्य अनेक यदुवंशी सारे देश में बिखर चुके थे। कुछ तो पर्वतों की गुफाओं में रह रहे थे।
अत: भगवान कृष्ण योग माया से इस प्रकार बोले," देव की कथा वसुदेव कंस के कारागार में बंदी है और इस समय मेरा पूर्ण अंश, शेष, देवकी के गर्भ में है। तुम शेष को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर सकती हो। इस व्यवस्था के बाद में अपनी समस्त शक्तियों के सहित स्वयं देवकी के गर्भ में अवतरित होने जा रहा हूं। फिर मैं देव की कथा वसुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हूंगा। तब तुम वृंदावन में नंद यशोदा की पुत्री के रूप में प्रकट होना।
"क्योंकि तुम मेरी सह भगिनी के रूप में जन्मोगी, और क्योंकि तुम शीघ्र इंद्रिय तृप्ति की इच्छाओं की पूर्ति करोगी। अत: संसार के सभी लोग सभी प्रकार की मूल्यवान भेटो यथा- अ गुरु, बत्ती, पुष्प तथा यज्ञ की हवि- तुम्हारी पूजा करेंगे। जिन लोगों को भौतिकता से प्रेम है वे तुम्हारी अंश के विभिन्न रूपों में, जो दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चंडीका, कृष्णा, माधवी, कन्यका, माया, नारायणी, इशानी, शारदा तथा अंबिका नाम से अभिहित होंगे, तुम्हारी पूजा करेंगे।"
कृष्ण कथा योग माया भाई तथा बहन- परम शक्तिमान तथा परम शक्ति के रूप में प्रकट हुए। यद्यपि शक्तिमान तथा शक्ति में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है, तथापि शक्ति सदैव ही शक्तिमान के अधीन रहती है। जो लोग भौतिकवादी है, वे शक्ति के उपासक हैं, किंतु जो अध्यात्म वादी हैं, वे शक्तिमान के पूजक हैं। कृष्ण परम शक्तिमान है और भौतिक जगत में दुर्गा परम शक्ति है। वास्तव में वैदिक संस्कृति में लोग शक्तिमान तथा शक्ति दोनों की एक साथ पूजा करते हैं। विष्णु तथा देवी के ऐसे लाखों मंदिर होंगे और कहीं-कहीं तो इन दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। शक्ति दुर्गा अथवा कृष्ण की बहिरंगा शक्ति के उपासकों को सरलता पूर्वक सभी प्रकार की भौतिक सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं, किंतु यदि कोई आध्यात्मिक दृष्टि से ऊपर उठना चाहता है, तो उसे कृष्ण चेतना के अनुसार शक्तिमान की पूजा करनी चाहिए।
भगवान ने योग माया से यह भी घोषित कर दिया कि उनका पूर्णांश 'अनंत या शेष' देवकी के गर्भ में स्थित है। रोहिणी के गर्भ में बलपूर्वक ले जाए जाने के कारण वे संकर्षण कहलाएंगे और वे समस्त देवी शक्तियां बल के स्रोत होंगे जिसके द्वारा लोग जीवन का सर्वोच्च आनंद, जिसे रमण कहते हैं, प्राप्त कर सकेंगे। अत: पूर्णांश अनंत अपने अवतार के पश्चात संकर्षण या बलराम नाम से प्रसिद्ध होंगे।
कोई परमेश्वर या किसी प्रकार के आत्म साक्षात्कार के परम स्तर को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक बलराम की पर्याप्त कृपा ना हो। बल का अर्थ शारीरिक शक्ति नहीं है। न हीं शारीरिक शक्ति से किसी को आध्यात्मिक सिद्धि मिल सकती है। उसमें आध्यात्मिक शक्ति होनी चाहिए, जो बलराम या संकर्षण द्वारा प्रदत की जाती है। अनंत या शेष शक्ति का स्रोत है, जो समस्त लोकों को उनकी विविध स्थितियों में धारण किए रहती है। भौतिक रूप से धारण करने की यह शक्ति गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहलाती है, किंतु वास्तव में यह संकर्षण शक्ति का ही प्रदर्शन है। बलराम या संकर्षण आध्यात्मिक शक्तियां आदि गुरु है। अत: भगवान नित्यानंद प्रभु, जो बलराम के अवतार भी हैं ,आदि गुरु हैं और गुरु भगवान बलराम का प्रतिनिधि होता है, जो आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। चैतन्यचरितामृत में इसकी पुष्टि की गई है कि गुरु कृष्ण की कृपा का प्राकट्य है।
जब भगवान ने योग माया को इस तरह आदेश दिया, तो उसने उनकी प्रदक्षिणा की तब उनकी आज्ञा अनुसार वह इस भौतिक जगत में प्रकट हुई। जब भगवान की परम शक्ति योग माया ने शेष को देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किया, तो वे दोनों ही योग माया के वश में थी, जिसे योगनिद्रा कहते हैं। जब ऐसा हो चुका, तो लोगों ने समझा कि देवकी का सातवां गर्भ विनष्ट हो गया। इस तरह यद्यपि बलराम देवकी के पुत्र रूप में अवतरित हुए, किंतु रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किए जाने के कारण उनके पुत्र कहलाए। इस व्यवस्था के बाद, अपने निष्काम भक्तों की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पूर्ण अचिंत्य शक्तियों सहित संपूर्ण सृष्टि के स्वामी के रूप में वसुदेव के मन में प्रवेश किया। इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य हो कि भगवान कृष्ण पहले वसुदेव के निष्काम हृदय में प्रविष्ट हुए और तत्पश्चात देवकी के हृदय में स्थानांतरित हुए। वह देवकी के गर्भ में वीर्य द्वारा स्थापित नहीं हुए थे। भगवान अपनी अचिंत्य शक्ति से किसी रूप में प्रकट हो सकते हैं। उनके लिए यह अनिवार्य नहीं कि वह स्त्री के गर्भ में वीर्य-क्षेपण की सामान्य विधि द्वारा प्रकट हो।
जब वसुदेव भगवान को अपने हृदय में धारण किए हुए थे, तो वे उस देदीप्यमान सूर्य की भांति लग रहे थे जिसकी प्रखर किरणें सदा असहनीय होती है और सामान्य जनों को झुलसा ने वाली होती है। वसुदेव के शुद्ध निष्काम हृदय में स्थित भगवान का रूप कृष्ण के आदि रूप से भिन्न नहीं था। कहीं भी और विशेष रूप से हृदय के भीतर श्री कृष्ण के रूप का उदय धाम कहलाता है। धाम से कृष्ण के केवल रूप का नहीं, अपितु उनके नाम, गुण तथा साज-सामान का भी बोध होता है। यह सब एक साथ प्रकट होता है।
इस प्रकार भगवान का शाश्वत रूप अपनी पूर्ण शक्तियों समेत वसुदेव के मन से देवकी के मन में उसी तरह स्थानांतरित हुआ जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्य की किरणें पूर्व में उदय होने वाले पूर्ण चंद्रमा में चली जाती है।
भगवान कृष्ण वसुदेव के शरीर से देवकी के शरीर में प्रविष्ट हुए। वे सामान्य जीव की परिस्थितियों से परे थे। चूँकि कृष्ण वहां थे,अत: यह समझना चाहिए कि उनके सारे पूर्ण अशं यथा नारायण तथा सभी अवतार,यथा नृसिंह, वराह इत्यादि उनके साथ साथ थे और उन पर भी इस जगत की परिस्थितियां काम नहीं कर रही थी। इस प्रकार देवकी उन भगवान का वास स्थान बन गई, जो अद्वितीय है और सारी सृष्टि के कारण हैं। यद्यपि देवकी परम सत्य का वास स्थान बन गई, किंतु कंस के घर के भीतर रहने के कारण वे शमित अग्नि या दूरूपयुक्त विद्या की भांति दिखाई पड़ती थी। जब अग्नि किसी पात्र में रखी जाती है या किसी घड़े में रखी जाती है, तो अग्नि की प्रकाशमान किरणें नहीं दिखती। इसी प्रकार से, वह दूरूपयुक्त ज्ञान, जिससे सामान्य जनता को लाभ नहीं पहुंचता, प्रशंसित नहीं होता। इसी प्रकार देवकी कंस के महल के कारागार की दीवारों के भीतर रखी गई थी जिससे कोई भी उनके उस दिव्य सौंदर्य को देख नहीं सकता था, जो उनके गर्भ में भगवान के आने से उत्पन्न हुआ था।
किंतु कंस ने अपनी बहन के इस दिव्य सौंदर्य को देखा और वह तुरंत इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भगवान ने उसके गर्भ में शरण ले ली है। इसके पहले वह इतनी अधिक सुंदर कभी नहीं लगी थी। वह स्पष्ट रूप से समझ गया कि देवकी के गर्भ में कोई कुतूहल पूर्ण वस्तु अवश्य है। अत: कंस विचलित हो गया। उसे विश्वास था कि भविष्य में उसका वध करने वाले भगवान का आगमन हो चुका है। कंस सोचने लगा: अब देवकी का क्या किया जाए? उसके गर्भ में निश्चित रूप से विष्णु या कृष्ण है, अत: यह निश्चित है की कृष्ण देवताओं का उद्देश्य पूरा करने के लिए आ गए हैं। यदि मैं तुरंत देवकी का वध भी कर दू, तो उनका उद्देश्य विफल नहीं हो सकता। "कंस भली भांति जानता था कि विष्णु के उद्देश्य को कोई विफल नहीं कर सकता। कोई भी बुद्धिमान पुरुष जान सकता है कि भगवान के नियमों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। सारे असुर चाहे कितनी ही विघ्न क्यों ना डालें, भगवान का उद्देश्य पूरा होकर रहेगा। कंस ने सोचा," यदि इस समय में देवकी को मारता हूं, तो विष्णु अपनी परम इच्छा को अधिक तीव्रता से लागू करेंगे। देवकी को इस समय मारना सबसे गणित कार्य होगा। भले कोई कितनी ही विषम परिस्थिति में क्यों ना हो, किंतु वह अपनी ख्याति नष्ट करना नहीं चाहता। यदि इस समय में देवकी को मारता हूं, तो मेरी ख्याति नष्ट हो जाएगी। आखिर, देवकी एक अबला है और वह मेरी शरण में है, वह गर्भवती है और यदि मैं उसे मारता हूं, तो मेरी ख्याति मेरे जीवन भर के पुण्य का फल तदा मेरे जीवन की अवधि है, समाप्त हो जाएगी।"
उसने आगे भी विचार किया," जो व्यक्ति अत्यधिक क्रूर होता है, वह इसी जीवन काल में मृततुल्य रहता है। क्रूर पुरुष अपने जीवन काल में किसी को प्रिय नहीं होता और उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे कोसते हैं। अपनी देहात्म बुद्धि के कारण मनुष्य का पतन होता है और नरक के अंतिम भाग में धकेल दिया जाता है।" कंस ने उस समय देवकी के वध के पक्ष और विपक्ष पर इस प्रकार से विचार किया। अंत में कंस ने देवकी को तुरंत ना मारकर अपरिहार्य भविष्य की प्रतीक्षा करने का निर्णय किया। किंतु उसका मन भगवान के प्रति शत्रुता से भर गया। वह धैर्य पूर्वक शिशु जन्म की प्रतीक्षा करने लगा, जिससे वह उनका वध कर सके जैसा कि उसने देवकी के अन्य बालकों के साथ किया था। इस प्रकार भगवान के प्रति शत्रुता के सागर में निमग्न वह बैठते, सोते, चलते, फिरते, खाते, काम करते- जीवन की सभी अवस्थाओं में- कृष्ण अथवा विष्णु के ही विषय में सोचने लगा। उनका मन भगवान के विचार में इतना लीन हो गया कि उसे अपने चारों ओर विष्णु या कृष्ण ही दिखते। दुर्भाग्यवश, यद्यपि उसका मन विष्णु के विचार में इतना लीन था, तथापि वह भक्त नहीं माना जाता, क्योंकि वह कृष्ण को शत्रु के रूप में सोचता था। महान भक्त के मन की दशा भी ऐसी ही होती है कि वह सदैव कृष्ण में लीन रहता है, किंतु भक्त भगवान के अनुकूल सोचता है, प्रतिकूल नहीं। कृष्ण के अनुकूल सोचना कृष्ण भक्ति है, किंतु कृष्ण के विपरीत सोचना कृष्ण भक्ति नहीं है।
उस समय ब्रह्मा तथा शिवजी नारद जैसे ऋषियों तथा अनेक देवताओं के साथ कंस के घर में अदृश्य रूप में प्रकट हुए। वे भक्तों को अत्यंत प्रिय एवं उनकी कामनाओं को पूर्ण करने वाली चुनी हुई स्तुतियों से भगवान की प्रार्थना करने लगे। उनके पहले शब्दों द्वारा यह घोषणा होती थी कि भगवान अपने प्रण के सच्चे होते हैं। जैसा की भागवत गीता में कहा गया है, श्री कृष्ण इस भौतिक जगत में पवित्र आत्माओं की रक्षा करने तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए अवतरित होते हैं। यही उनका प्रण है। देवता जान गए थे कि अपने प्रण को पूरा करने के लिए उन्होंने देवकी के गर्भ में वास किया है। देवता परम प्रसन्न थे कि भगवान अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए प्रकट हो रहे हैं, अत: उन्होंने उन्हें सत्यम परम कहकर संबोधित किया।
प्रत्येक व्यक्ति सत्य की खोज में लगा है। यही जीवन की दार्शनिक रीति है। देवता गण जानकारी देते हैं कि परम सत्य कृष्ण ही है। जो पूर्णत कृष्ण भावना भावित हो जाता है, वह परम सत्य को प्राप्त कर सकता है। कृष्ण की परम सत्य है। शाश्वत काल की तीन अवस्थाओं में सत्य है, सापेक्ष सत्य नहीं। काल भूत, वर्तमान तथा भविष्य में विभाजित है। भौतिक जगत में प्रत्येक वस्तु परम काल द्वारा- भूत, वर्तमान तथा भविष्य के द्वारा- नियंत्रित हो रही है; किंतु सृष्टि के पूर्व कृष्ण विद्यमान थे; सृष्टि के हो जाने पर प्रत्येक वस्तु कृष्ण पर आश्रित है और जब यह सृष्टि समाप्त होगी, तू कृष्ण बचे रहेंगे। अंत: वे सभी परिस्थितियों में परम सत्य हैं यदि भौतिक जगत में सत्य हैं, तो यह परम सत्य से उदित है। यदि इस भौतिक जगत में कहीं वैभव है, तो इसके स्रोत कृष्ण ही है। यदि संसार कुछ में ख्याति है, तो कृष्ण ही उसके कारण है। यदि संसार में कोई बल है, तू इस शक्ति के कारण कृष्ण हैं। यदि संसार में कोई ज्ञान तथा शिक्षा है, तो उसके कारण स्वरूप कृष्ण हैं। इस तरह कृष्ण सारे सत्यो के स्रोत हैं।
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