Monday, June 1, 2020

(ग) चंद्रहास की भक्ति का प्रभाव

उधर किसी ने आकर धृष्ट बुद्धि से कहा कि देवी के मंदिर में तुम्हारे पुत्र को वधिकों ने मार डाला। सुनते ही वह रोने लगा, उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी। तुरंत ही वह देवी के मंदिर में गया, मृत पुत्र को देखते ही व्याकुल होकर गिर पड़ा और पत्थर पर सिर पटक-पटक मर गया। किसी का क्या वश, वह ऐसा ही अभागा था। जब राजा चंद्रहास ने यह समाचार सुना तो वे भी देवी के मंदिर में आए। देवी के चरणों का ध्यान करके स्वयं अपना सिर काटकर अर्पण करने के लिए तैयार हो गए। तब देवी ने कहा कि यह धृष्ट बुद्धि तो तुम्हारा द्रोही था। इसे तो क्रोध करके मैंने ही मारा है। चंद्रहास जी ने कहा कि मृत्यु तो मेरी थी, मेरे बदले मदनसेन आए और मारे गए। पुत्र वध सुनकर पिताजी आए और मर गए। यह दोनों निरपराध है। इसलिए दोनों जीवित हो जाएं, कृपा करके ऐसा वरदान दीजिए। चंद्रहास के प्रार्थना करते ही दोनों जीवित हो गए। धृष्ट बुद्धि को सात्विक की बुद्धि आ गई। भक्ति महिमा समझकर दोनों बड़भागी हो गए।

चंद्रहास जी ने ऐसा राज्य किया कि देश के सभी लोग भक्तराज हो गए। घर-घर में जन-जन के मुख से सुंदर हरी-हरी नाम सुनाई देता था। प्रेम-वश लोग राजा चंद्रहास को सदा आंखों से सामने ही रखना चाहते थे। राजा चंद्रहास का चरित्र आदि से अनंत तक हृदय को आनंदित करने वाला है।

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