Sunday, May 31, 2020

(ख) चंद्रहास के साथ धृष्ट बुद्धि का षड्यंत्र

चंद्रहास ने कुंतलपुर के राजा को कर देना बंद कर दिया था, राजा ने कर वसूल करने के लिए मंत्री धृष्ट बुद्धि के साथ सेना वहां भेजी। मंत्री को घर आया जानकर चंद्रावती के राजा ने उसका बड़ा सम्मान किया। मंत्री ने चंद्रहास को पहचान लिया कि यह वही बालक है। मन में खींझकर निश्चय किया कि कपट का जाल फैला कर अब इसे मारूंगा। कर लेने की बात पीछे पड़ गई। धृष्ट बुद्धि ने एक चिट्ठी लिखकर चंद्रहास को दी और कहा कि इसे मेरे लड़के मदन सिंह के हाथ में दे देना और कहना कि इसमें जो लिख लिखा कर लाया हूं, उस कार्य को जल्दी ही कर दीजिए। चंद्रहास जी पत्र लेकर कुंतलपुर को चलें। नगर के समीप एक बाग में सेवा समय जानकर रुके। आनंद मग्न होकर शालग्राम- भगवान की सेवा की, फिर विश्राम करने लगे और वही सो गए।

उसी बाग में मंत्री धृष्टबुद्धि की लड़की अपनी सहेलियों के साथ खेलती हुई आयी। चंद्रहास के सौंदर्य को देखकर उसे बड़ा अनुराग हुआ, फिर निकट से देखने के लिए अपनी सहेलियों से अलग होकर चंद्रहास के समीप आई और इनकी रूप माधुरी को देखकर उनमें प्रेमासक्त हो गई। शोभा सौंदर्य के मद से मतवाली उस लड़की ने चंद्रहास की पगड़ी में रखी हुई चिट्ठी को झुक कर धीरे से खींच लिया। उसे बाँचा तो उसमें लिखा था कि पुत्र मदन! बिना कुछ सोच विचार किए चिट्ठी लाने वाले इस बालक को शीघ्र विष दे दो। यह है बाँचकर मंत्री की लड़की अपने पिता पर नाराज हुई कि मेरा नाम लिखते लिखते ऐसी भूल की। उसका नाम विषया था। उसने आंख के काजल से विष के आगे 'या' और बना दिया, फिर आनंद की उमंग में मग्न अपनी सहेलियों में आ मिली और घर चली गई।

चंद्रहासजी उठे और मंत्री पुत्र मदन सिंह के पास आए। चंद्रहास उसे बहुत प्रिय लगे। उसने चंद्रहास को प्रेम पूर्वक गले से लगा लिया। चंद्रहास ने उसके हाथ में पत्र दिया, जिसे पढ़कर उसने कहा कि इसमें तो मेरे मन को अत्यंत प्रिय लगने वाली बात लिखी है। उसने जल्दी से ब्राह्मण को बुलवाकर एक ही घड़ी में चंद्रहास के साथ अपनी बहन विषया का विवाह कर दिया। कुछ समय बाद नीच धृष्ट बुद्धि आया। विवाह की बात सुनकर उसे ऐसा लगा मानो इधर-उधर घूम घूम कर मौत ही उस पर आ गई हो। चंद्रहास को दूलह के वेष में देखकर उसके मन में बड़ा भारी दुख हुआ।

धृष्ट बुद्धि ने एकांत में बैठकर अपने लड़के से पूछा कि तुमने यह भूल कैसे की? मदनसेन ने कहा कि मैंने बिल्कुल वही सब काम किया जो कि आपने अपने हाथ से पत्र में लिखा था। ऐसा कहकर उसने वह पत्र पिताजी को दिखा दिया। उसे पढ़ कर उसके शरीर में आग- सी लग गई। वह मन में विचारने लगा कि मैं तो बड़ा ही अभागा हूं, अभी मैं इसे मरवा डालूंगा। दासी पुत्र में आसक्त बेटी का विधवा हो जाना ही अच्छा है। ऐसा विचार कर उस धृष्टबुद्धि ने गुपचुप तरीके से नीच वधिको को बुलाकर कहा कि आप देवी के मंदिर में जाकर बैठो, वहां जो कोई पूजा करने आए, उसे मार डालना। फिर वह चंद्रहास से बोला कि आप जाकर देवी का पूजन कर आइए। वे मेरी कुलपूज्या है। विवाह के बाद अकेले ही जाकर वर द्वारा देवी पूजन की रीति मेरे वंश में सदा से चली आ रही है।

धृष्ट बुद्धि के कथन अनुसार चंद्रहास जी देवी का पूजन करने चले। इसी बीच कुंतलपुर के राजा ने सभा में कहा कि मेरे कोई लड़का नहीं है, इसलिए मंत्री के दामाद चंद्रहास को ही राज्य दे दूँ। सर्वसम्मति से निश्चय करके राजा ने मदनसेन से कहा कि तुम शीघ्र ही चंद्रहास जी को जाकर ले आओ। यह सुनकर मदन सेन सुख पाकर शीघ्र ही दौड़े। मार्ग में ही चंद्रहास को पाकर प्रसन्न हुए और बोले कि आप शीघ्र ही राज्यसभा में चले जाइए। राजा आपको राज्य देना चाहते हैं। आप देवी के अपमान से मत डरिए। उनका मानसिक ध्यान कर लीजिए। मैं आपके बदले जाकर देवी का पूजन करूंगा। यह कहकर मदन सेन देवी के मंदिर में गए। वहां जाते ही पहले से बैठे हुए वधिको को ने उन्हें मार डाला। इधर चंद्रहासजी के राज सभा में पहुंचते ही राजा ने उनका राज्य अभिषेक कर दिया। सभी लोग सम्राट चंद्रहास की जय-जयकार करने लगे।

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