Saturday, May 30, 2020

श्री चंद्रहासजी (क) अनाथ चंद्रहास पर भगवान शालिग्राम की कृपा

केरल में एक सुधार्मिक नाम का राजा था, उसी के पुत्र भक्त चंद्रहास जी हुए। जन्म के थोड़े दिन बाद ही इनके पिता संग्राम में वीरगति को प्राप्त हो गए और माता सती हो गई। शासन शत्रुओ के हाथ में चला गया। तब धाय मँमा चंद्रहास को लेकर कुंतलपुर चली गई और वहां के मंत्री धृष्ट बुद्धि के यहां रहने लगी तथा चंद्रहास को अपना बालक बताकर उसका पालन पोषण करने लगी। चंद्रहास अभी पाँच ही वर्ष के हुए थे कि धाय माँ का भी स्वर्गवास हो गया। अब अनाथ हो गए। चंद्रहास अपने सामान अवस्था वाले बालकों के साथ भक्ति रस वर्धक खेल खेला करते थे। एक दिन कृपालु नारद जी ने आकर दर्शन दिया और एक शालिग्राम की छोटी सी मूर्ति समेत भगवान नाम का उपदेश दिया। चंद्रहास जी नित्य उसकी पूजा करके उसे मुख में रख लेते थे। एक दिन धृष्ट बुद्धि के यहां ब्राह्मण भोज हुआ, संयोगवश चंद्रहास जी वही खेल रहे थे, जहां ब्राह्मणों में प्रधान विद्वान बैठे थे। उस समय धृष्ट बुद्धि ने वहां आकर पूछा कि मेरी कन्या का कैसा भाग्य है, इसे कैसा पति प्राप्त होगा? तब वे सब चंद्रहास की ओर संकेत करके बोल उठे कि यही तेरी कन्या का पति होना चाहिए। दासी पुत्र मेरी कन्या का पति होगा, यह जानकर वह लज्जा से घुल गया। दृष्टि बुद्धि बड़ी सोच विचार में पड़ गया कि यदि ऐसा हुआ तो मेरी बड़ी अप कीर्ति होगी। इसलिए अब यही विचार ठीक है कि इस लड़के को ही मरवा डाला जाए। ऐसा निश्चय करके उसने वधिको को को बुलाकर कहा कि इसे मार डालो। धृष्ट बुद्धि की आज्ञा से अधिक लोग चंद्रहास को दूर निर्जन वन में ले गए और कहने लगे- हम तुम्हें मारेंगे बताओ, अब तुम्हारा रक्षक कौन है? चंद्रहास ने कहा कि मैं तुमसे केवल एक बात मागँता हूँ कि तुम लोग थोड़ी देर रुको, जब मैं कहूं, तब मुझ पर हथियार चलाना।

वधिकों ने बात मानी ली, चंद्रहास ने अपने मुख से एक गोलशालिग्राम की मूर्ति को निकालकर वन के पत्र पुष्पों से उसकी प्रेम पूर्वक सेवा की। मूर्ति को पुन: मुख में रखकर ध्यान में तल्लीन हो गए। प्रभु की छवि को हृदय में धारण कर नेत्रों के इशारे से वधिको को मार डालने की आज्ञा दे दी। वधिक मूर्छित होकर गिर पड़े। थोड़ी देर बाद वे सावधान हुए उनके ह्रदय में दया आ गई। चंद्रहास के बाएं पैर में 6 अंगुलियां थी, जो एक दोष था। वधिकों ने छठी अँगुली धृष्टबुद्धि को दिखाने के लिए काट ली। जो अच्छा ही हुआ। वधिको ने जाकर कटी अंगुली धृष्ठ बुद्धि को दिखा कर कहा कि हमने उसे मार डाला। उसने भी अंगुली पहचान कर उनकी बात को सत्य मान लिया।

कुंतलपुर के राजा के राज्य में एक छोटा राज्य और था, जिसकी राजधानी चंदनावती नगरी थी। वहां का राजा कुलिंद कुंतलपुर के राजा को प्रति वर्ष कर देता था। वह सब प्रकार के सुखों और संपत्तियों से संपन्न था, पर उसके कोई पुत्र नहीं था। वह उसी जंगल से होकर निकला और उस चंद्रहास को देखकर अति प्रसन्न हुआ; क्योंकि जिस पक्षी की छाया पड़ने से मनुष्य चक्रवर्ती सम्राट हो जाता है, उसी पक्षी ने अपने पक्ष से छाया कर रखी थी और हिरनिया चारों ओर से उसे घेरे खड़ी थी। चंदनावती के राजा कुलिंद ने निसंकोच दौड़कर बालक को गोद में उठा लिया और घर लाकर पुत्र जन्म के समान आनंद मंगल मनाया। कुछ दिनों के बीत जाने के बाद राजा ने सोच-विचार करके चंद्रहास को राज सिंहासन पर बैठा कर उसका राजतिलक कर दिया। चंद्रहासिनी राज्य पाकर अपने राज्य में भाव भक्ति का बड़ा भारी प्रचार प्रसार किया।

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