Thursday, May 28, 2020

अंत नहीं है लोभ का...

एक बार एक नाई कहीं जा रहा था। जाते-जाते एक जगह एक पेड़ के नीचे अचानक उसे सुनाई दिया, मानो कोई कह रहा है, 'सात गड़ा धन लेगा?' नाई ने आश्चर्यचकित हो चारों ओर देखा, किंतु कहीं कोई दिखाई नहीं दिया। परंतु साथ घड़ा धन की बात सुनकर उसके मन में लालच पैदा हुआ और वह जोर से बोल उठा- 'हां, लूंगा!' त्यों ही उसे फिर वही आवाज सुनाई दी - 'अच्छा, तेरे घर पर रख आया हूं, जा, ले-ले।'

नाई ने घर आकर देखा, सचमुच ही साथ खड़े रखे हुए हैं। उसने सब घरों को खोल कर अच्छी तरह देखा, तो उसे दिखाई दिया कि झगड़े तो सोने की मोहरों से भरे हैं, पर सातवां घड़ा कुछ खाली है। उसके मन में सातवीं घड़े को भी पूरा भरने की तीव्र इच्छा उठी और उसने घर में जितना भी धन, गहने आदि थे, वह सब लाकर उस घड़े में डाल दिए। पर भला इतने से वह घड़ा कैसे भरता! घड़े को पूरा भरने के लिए नाई बड़ा व्याकुल रहने लगा। घर गृहस्ती के खर्च में कटौती करते हुए वह बचा हुआ सारा धन घड़े में डालने लगा। अंतिम में उसने राजा से प्रार्थना की कि उसे जो वेतन मिलता है, उससे उसका गुजारा नहीं हो पाता, दया करके वेतन बढ़ा दिया जाए। राजाओ सुनाई पर खुश था। उसके कहते ही राजा ने वेतन दुगना कर दिया। पर नाई की दशा पहले जैसे ही रही। अब तो वह लोगों से मांगकर खाता और पूरा वेतन घड़े में डाल देता। पर खड़ा था कि भरने का नाम ही नहीं लेता।

दिनों दिन नाई की हालत बिगड़ते देख एक दिन राजा ने पूछा- 'क्यों रे! तुझे जब कम वेतन मिलता था, तब तो तेरी गुजर-बसर अच्छी तरह से हो जाती थी, और अब दुगना वेतन पाकर भी तेरी ऐसी दशा क्यों है? तू क्या साथ घड़ा धन ले आया है?' नाई ने हक्का-बक्का होकर कहा- 'जी, आपको किसने बताया?' राजा ने कहा- 'अरे! वह तो यक्ष का धन है! उस समय यक्ष ने आकर मुझसे भी पूछा था, 'सात गड़ा धन लोगे?' मैंने पूछा- 'वह धन जमा करने के लिए है या खर्च करने के लिए?' तब वह बिना उत्तर दिए भाग गया। वह दिन कभी नहीं लेना चाहिए, उसे खर्च नहीं किया जा सकता, सिर्फ जमा ही करना पड़ता है। तू भला चाहता है, तो जल्दी बहुत धन लौटा आ।' तब नाई को होश आया और तब झटपट उस जगह पर जाकर चिल्ला कर बोल आया- 'तुम्हारा धन तुम ले जाओ, मुझे नहीं चाहिए।' यक्ष ने कहा- 'ठीक है।' घर लौटकर नाई ने देखा कि वह 7 घड़े गायब हो गए हैं। दुख की बात यह थी कि इतने दिनों तक पेट को काटते हुए उसने उस खाली घड़े में जो कुछ भी धन डाला था, वह सब भी चला गया।

"वास्तव में लोभ रूपी सातवां घोड़ा कभी नहीं भरता।"

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