यह भौतिक जगत पांच प्रमुख तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश- से बना हुआ है और यह सारे तत्व कृष्ण से ही उदित है। भौतिक विज्ञानी इन पांच मूल तत्वों को भौतिक सृष्टि का कारण मानते हैं, किंतु यह सारे तत्व अपनी स्थूल तथा सूक्ष्म अवस्थाओं में कृष्ण द्वारा ही उत्पन्न है। इस भौतिक जगत में कार्यरत समस्त जीव भी उनकी तटस्था तथा शक्ति के प्रतिफल हैं। भगवत गीता के सातवें अध्याय में स्पष्ट कहा गया है कि यह सारा संसार कृष्ण की परा तथा अपरा नामक दो प्रकार की शक्तियों का संयोग है। जीवात्माऐंँ भगवान की परा शक्ति है और निर्जीव भौतिक तत्व अपरा शक्ति है। सुप्ता अवस्था में प्रत्येक वस्तु कृष्ण में समाहित रहती है।
देवता गण भौतिक प्राकृतिक के विश्लेषण- अध्ययन द्वारा भगवान के परम रूप की सादर प्रार्थना करते रहे। यह भौतिक प्राकृतिक क्या है? यह एक वृक्ष के समान है। वृक्ष भूमि पर खड़ा रहता है। इसी तरह भौतिक प्राकट्य रूपी यह वृक्ष प्रकृति रूपी भूमि पर खड़ा है। इस भौतिक प्राकट्य की तुलना वृक्ष से की जाती है, क्योंकि समय आने पर वृक्ष को काट लिया जाता है। वृक्ष का अर्थ है, वह जो अनंत काट लिया जाएगा। अतः भौतिक प्राकट्य का यह वृक्ष परम सत्य नहीं माना जा सकता क्योंकि इस पर काल का प्रभाव पड़ता है, किंतु कृष्ण का शरीर शाश्वत है। वे भौतिक प्राकट्य के पहले भी विद्यमान थे, भौतिक जगत के अस्तित्व में होने पर भी विद्यमान हैं और जब इसका विलय हो जाएगा तब भी वे विद्यमान रहेंगे। अतः केवल कृष्ण को ही परम सत्य माना जा सकता है।
कठोपनिषद में भी प्रकृति रूपी भूमि पर खड़े हुए भौतिक जगत रूपी वृक्ष का उदाहरण मिलता है। इसमें दो प्रकार के फल होते हैं- सुख तथा दुख। इस शरीर रूपी वृक्ष में रहने वाले प्राणी दो पक्षियों के समान होते हैं। एक पक्षी कृष्ण का अंतर्यामी स्वरूप है, जो परमात्मा कहलाता है और दूसरा पक्षी जीव है। जीव इस भौतिक जगत के फलों को खा रहा है। कभी यह सुख का फल खाता है, तो कभी दुख का फल। किंतु दूसरा पक्षी सुख या दुख के फलों को खाने में रुचि नहीं लेता, क्योंकि वह आत्म- तुष्ट है। कठोपनिषद में कहा गया है कि इस शरीर रूपी वृक्ष का एक पक्षी फल खा रहा है और दूसरा केवल साक्षी रूप में देख रहा है। इस वृक्ष की जड़ें तीन दिशाओं में फैली है। इसका अर्थ यह हुआ कि वृक्ष की यह जड़े प्रकृति के तीन गुण सतो, रजो तथा तमोगुण। जिस प्रकार वृक्ष की जड़े फैलती हैं उसी प्रकार प्रकृति के गुणों के संसर्ग से मनुष्य अपने जीवन अवधि बढ़ाता है। इन फलों का स्वाद चार प्रकार का है- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। प्रकृति के तीन गुणों के साथ विभिन्न प्रकार के संसर्ग उनके फल स्वरूप जीव विभिन्न प्रकार के धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का स्वाद लेता है। व्यवहारिक रूप में सारा भौतिक कार्य अज्ञान में किया जाता है, किंतु तीन प्रकार के गुण होने से कभी-कभी यह अज्ञान सतो या रजोगुण से आच्छादित रहता है। इन भौतिक फलों का स्वाद पांच इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया जाता है। पांच इंद्रियां, जिनके द्वारा ज्ञान अर्जित किया जाता है, छह प्रकार के दोषों से प्रभावित होती है- शोक, मोह, दुर्बलता, मृत्यु, भूख तथा प्यास। यह भौतिक शरीर या भौतिक जगत सात कोशो से ढका है- त्वचा, पेशी, मांस, मज्जा, अस्थि, वसा तथा वीर्य। वृक्ष की आठ शाखाएं हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु शून्य, मन, बुद्धि तथा अहंकार। इस शरीर में नौ द्वार हैं-दो आंखें, दो नथुने, दो कान, एक मुँह, एक शिश्न, एक गुदा। और इस शरीर के भीतर दस प्रकार के आंतरिक वायु हैं- प्राण, आपान, उदान, व्यान, समान इत्यादि। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इस वृक्ष पर बैठे दो पक्षी जीव आत्मा तथा अंतर्यामी भगवान है।
यहां पर वर्णित भौतिक जगत के मूल कारण भगवान ही हैं। वे अपना विस्तार करते हैं और भौतिक जगत के तीन गुणों को अपने अधिकार में करते हैं। विष्णु सतोगुण को संभालते हैं, ब्रह्मा रजोगुण को शिवजी तमोगुण का भार ग्रहण करते हैं। ब्रह्मा रजोगुण के इस सृष्टि को उत्पन्न करते हैं,विष्णु सतोगुण से इसका पालन करते हैं और शिवजी तमोगुण से किसका संहार करते हैं। संपूर्ण सृष्टि परमेश्वर पर आश्रित है। वे हीं इसकी उत्पत्ति, पालन तथा संहार के कारण है। और जब इस संपूर्ण सृष्टि का विलय हो जाता है, तो भगवान की शक्ति के रूप में यह सूक्ष्म सृष्टि भगवान के शरीर के भीतर स्थित रहती है।
देवताओं ने स्तुति की,"इस समय परमेश्वर कृष्ण इस जगत के पालन हेतु जन्म ले रहे हैं।" वास्तव में परम कारण एक ही है, किंतु प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा भ्रमित हो जाने के कारण अल्प ज्ञानी व्यक्ति समझते हैं कि यह जगह विभिन्न कारणों से प्रकट हो रहा है। जो बुद्धिमान है, वे देख सकते हैं कि इसका कारण एक, कृष्ण है। जैसा ब्रह्म- संहिता में कहा गया है- ईश्वर: परम: कृष्ण:.... सर्व-कारण-कारणम्। "भगवान कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं।" ब्रह्मा सृष्टि के लिए नियुक्त किए गए एजेंट हैं, विष्णु पालन के लिए कृष्ण के अंश है और शिवजी विलय के लिए कृष्ण के अंश हैं।
देवताओं ने स्तुति की, "हे स्वामी! आपके शाश्वत रूप को समझ पाना दुष्कर है। सामान्य जन आपके वास्तविक रूप को समझने में अक्षम रहते हैं, अत: आप अपना आदि शाश्वत रूप प्रकट करने के लिए स्वयं अवतार ले रहे हैं। लोग किसी तरह आप के विभिन्न अवतारों को तो समझ सकते हैं, किंतु दो भुजाओं वाले कृष्ण के शाश्वत रूप को,मनुष्य के बीच उन्हीं के समान विचरण करते देखकर वह उलझन में पड़ जाते हैं।आपका यह शाश्वत रूप भक्तों के दिव्य आनंद को बढ़ाता रहता है, किंतु अब भक्तों के लिए यह घातक है।" जैसा कि भगवत गीता में कहा गया है कृष्ण साधु के लिए अत्यंत मोहक है। परित्राणाय साधुनाम । किंतु यह रूप असुरों के लिए अत्यंत घातक है,क्योंकि कृष्ण असुरों के वध के लिए अवतरित होते हैं। अतः वे एक ही साथ भक्तों के लिए मोहक और असुरों के लिए घातक हैं।
"हे कमल के समान नेत्रों वाले प्रभु! आप शुद्ध सत्व के स्रोत हैं। ऐसी अनेक ऋषि हैं जिन्होंने केवल समाधि के द्वारा या आपके चरण कमलों के आध्यात्मिक ध्यान के द्वारा और इस तरह आपके विचार में लीन रहकर प्रकृति द्वारा उत्पन्न अज्ञान के महासागर को गोखुर में समाने वाले जल के समान बना दिया है। ध्यान का उद्देश्य मन को भगवान के चरण कमलों से प्रारंभ करके उन पर केंद्रित करना है। भगवान के चरण कमलों के ध्यान से ही बड़े-बड़े मुनि इस विशाल भवसागर को बिना कठिनाई के पार कर लेते हैं।
"हे स्वयं प्रकाशित! जिन महान संतों ने आपके चरण कमलों की दिव्य नाव के सहारे अज्ञान सागर को पार कर लिया है वे उस नाव को अपने साथ नहीं ले गए। वह अब भी इस बार पढ़ी हुई है।" यदि कोई नाव द्वारा नदी पार करता है, तो वह नाव को भी उस पार ले जाता है। अतः जब वह अपने गंतव्य पर पहुंच जाता है, तो फिर वही नाव किस प्रकार उन लोगों के लिए उपलब्ध हो सकती है, जो इस और प्रतीक्षा कर रहे हैं? इस कठिनाई का उत्तर देने के लिए देवता अपने स्तुति में कहते हैं कि भगवान के चरण कमलों की यह नाव ले नहीं जाई जाती। जो भक्तगण अब भी भवसागर के इस पार खड़े हैं वह दूसरी ओर जाने में समर्थ होते हैं, क्योंकि शुद्ध भक्त सागर को पार करते समय उसे अपने साथ नहीं ले जाते। जो कोई इस नाव के पास जाता है, तो भौतिक ज्ञान का सारा समुद्र सिमटकर गोपद में समा जाता है। अतः:भक्तों को दूसरी ओर जाने के लिए नाव की आवश्यकता ही नहीं पड़ती; वे तुरंत समुद्र पार कर लेते हैं। क्योंकि महान साधु पुरुष समस्त जीवों के प्रति दयालु होते हैं, नाव तब भी इस ओर पड़ी रहती है। कोई किसी समय उनके चरणारविंदो का ध्यान करके भौतिक अज्ञान के महासागर को पार कर सकता है।
ध्यान का अर्थ है भगवान के चरण कमलों पर एकाग्रता। चरण कमल भगवान के सूचक हैं। किंतु जो निर्विशेषवादी है, वे भगवान के चरण कमलों को नहीं मानते, उनके ध्यान का विषय निराकार होता है। देवताओं का यह पक्का निर्णय है कि जो लोग शून्य या निराकार का ध्यान करने में रुचि रखते हैं, वे अज्ञान के सागर को पार नहीं कर सकते। ऐसे लोग केवल यही सोचते हैं कि वह मुक्त हो गए हैं। "हे कमल नेत्र प्रभु! उनकी बुद्धि कलमषग्रस्त हो जाती है क्योंकि वे आपके चरण कमलों का ध्यान करने में असफल रहते हैं।" इस उपेक्षा-भाव के कारण निर्विशेषवादी संसार के बध्द जीवन में पुनः आ गिरते हैं, भले ही कुछ काल के लिए वे निराकार साक्षात्कार के पद तक पहुंच जाए। निर्विशेषवादी ब्रह्म तेज मैं लीन होने के लिए कठिन तपस्या करते हैं, किंतु उनके मन भौतिक कल्मष से मुक्त नहीं होते, गई चिंतन की भौतिक विधियों का निषेध मात्र करते रहते हैं। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं कि वे मुक्त हो चुके हैं। इस तरह भी नीचे गिर जाते हैं।
भगवत गीता में कहा गया है कि निर्विशेषवादीयो को चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महान यातनाएं सहन करनी पड़ती है। श्रीमद्भागवत के प्रारंभ में इसका भी उल्लेख है कि भगवान की भक्ति के बिना किसी को सकाम कर्मों के बंधन से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। भागवत गीता में भगवान कृष्ण का श्रीमद् भागवत में नारद मुनि का कथन है और यहां भी देवता इसकी पुष्टि करते हैं,"जो लोग भक्ति नहीं करते उन्हें ज्ञान का चरम लक्ष्य ज्ञात नहीं रहता। ऐसे लोगों को आपकी कृपा प्राप्त नहीं होती।" निर्विशेषवादी केवल यही सोचते हैं कि वे मुक्त हैं, किंतु वास्तव में उनमें भगवान के लिए कोई भावना नहीं होती। वे सोचते हैं कि जब कृष्ण इस जगत में आते हैं, तो भी भौतिक शरीर धारण करते हैं। इस प्रकार वे श्री कृष्ण के दिव्य शरीर की उपेक्षा कर देते हैं। भगवत गीता में इसकी पुष्टि हुई है- अवजानन्ति मां मूढा:। फलत: निर्विशेषवादी भौतिक वासना पर विजय पाने तथा मुक्ति तक पहुंचने के बावजूद नीचे गिर जाते हैं। यदि वे ज्ञान के लिए ही वस्तुओं को जानने में व्यस्त रहते हैं और भगवान की भक्ति नहीं करते, तू उन्हें वांछित फल प्राप्त नहीं हो सकता। उनकी हाथ लगता है केवल उनके द्वारा उठाया गया कष्ट, इससे अधिक कुछ नहीं।
No comments:
Post a Comment