Wednesday, May 27, 2020

काशी विश्वनाथ के बारे में सभी जानकारी (12 ज्योतिर्लिंगों में से एक)

काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है।ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है। महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभायात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।

निर्माण

वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 किग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था।

सामान्य तथ्य

हिंदू धर्म में कहते हैं कि प्रलय काल में भी इसका लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली यही भूमि बतलाई जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनकी नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होंने सारे संसार की रचना की अगस्त्यमुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थीउर्मी की अर्चना से श्री वशिष्ठ जी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मार्षि कहलाए।

महिमा

सर्वतीर्थमयी मोक्ष दायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राण त्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवागमन से छूट जाता है, चाहे वह मृत प्राणी भी क्यों ना हो। मत्स्य पुराण का मत है कि जप,ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों परपीड़ित जनों के लिए काशीपुरी ही एकमात्र गति है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने वाराणसी की स्थापना लगभग 5000 वर्षों पूर्व की थी। जिस कारण यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। ब्रह्मा पुराण, लिंग पुराण, मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिंदू ग्रंथों में इस नगर का उल्लेख किया जाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार वाराणसी को अत्यंत प्राचीन माना जाता है। वाराणसी के बारे में एक लेखक ने कहा था कि यह इतिहास से भी पुरातन है। वाराणसी शहर के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब रोशनी की सबसे पहली किरण यहीं पर पड़ी थी। स्कंद पुराण के काशी खंड में नगर की महिमा बताई जाती है जिसमें भगवान शिव ने एक श्लोक के जरिए वाराणसी का वर्णन किया है। यह शहर हिंदू धर्म में एक पवित्र नगर माना जाता है। साथ ही साथ बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना गया है। भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से जुड़ी हुई पौराणिक मान्यताएं और आश्चर्यजनक तथ्य भी जुड़े हुए हैं। यह शहर हर मायने में सबसे पूजनीय और पवित्र स्थल है। वाराणसी का सबसे पुराना उल्लेख महाभारत में मिलता है। आज सभी तीर्थ स्थल जो हम देख रहे हैं वे सब के सब प्राचीन समय में वन स्थलों में थे और मनुष्यों से रहे थे। कहीं-कहीं आदिवासियों का वास रहा होगा। कालांतर में कही गई कथाएं अस्तित्व में आई और तीर्थ बढ़ते गए। जिसके आसपास नगर और शहर भी बस गए। इस तीर्थ नगरी का नाम दो नदियों वरुणा और असी के नाम पर पड़ा। भारत की धार्मिक राजधानी की पवित्र यात्रा इस शहर की पवित्र गंगा नदी से एक अटूट और अहम रिश्ता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और देवी पार्वती का यहां निवास स्थान है ऐसा कहा जाता है जो भी सब से आखिर तक यहां जिंदा रहेगा उसे जरूर ही मोक्ष की प्राप्ति होगी।

वाराणसी एक ऐसा शहर है जहां आपको असंख्य संख्या में मंदिर देखने को मिल जाएंगे जो शैव तथा वैष्णव धर्म को समर्पित हैं। यह दोनों ही धर्म हिंदू धर्म के रूप हैं। यह जैन धर्म का भी प्रमुख केंद्र है। 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का यहां जन्म हुआ था। यहां हर एक चौराहे पर एक मंदिर है। यहां काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, काल भैरव मंदिर, संकट मोचन मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारत माता मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर सभी प्रमुख मंदिरों में आते हैं।

कहा जाता है कि भगवान शिव जी काशी के परमात्मा है इसीलिए इसी वजह से अन्य ग्रह अपनी मर्जी से यहां कुछ भी नहीं कर सकते जब तक शिवजी का आदेश ना हो। ऐसा कहा जाता है जब शनि देवता भगवान शिव जी की खोज में काशी आए थे तब वे उनके मंदिर में लगभग साढे सात सालों तक प्रवेश नहीं कर पाए थे। आप जब काशी विश्वनाथ मंदिर में जाएंगे तो मंदिर के बाहर ही आपको शनिदेव का मंदिर दिखाई देगा। यह शहर आध्यात्मिक केंद्र के साथ-साथ आयुर्वेद और योग के समग्र प्राचीन विज्ञान से भी जुड़ा हुआ है। वाराणसी धार्मिक शहर तो है ही शिक्षा और संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र है।

यह व्यापारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र है यहां मुख्यत सोने तथा चांदी से किए हुए काम कथा बनारसी सिल्क साड़ियों के लिए भी जाना जाता है। वाराणसी में कई दार्शनिक कवि, लेखकों ने जन्म लिया जिनमें वल्लभाचार्य स्वामी रामानंद, जयशंकर प्रसाद, रविदास, शिवानंद गोस्वामी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि। यह सभी वाराणसी में ही रहे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिंदू धर्म का परम पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं पर लिखा था। वाराणसी के अश्वमेघ घाट में एक अजीबोगरीब रिवाज होता है जिसमें हर साल बारिश के मौसम में मेढ़को की शादी कराई जाती है। यहां के पंडित मेंडको की शादी के सारे अनुष्ठान पूरे करके उन्हें नदी में छोड़ देते हैं।

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