"हे स्वामी! आपका अवतार, स्थिति तथा तिरोधान सारे भौतिक गुणों के प्रभाव से परे है। क्योंकि आप प्रत्येक वस्तु के नियामक तथा परब्रह्म है, अतः आपमे कुछ भी अकल्पनीय या विरोध मुलक नहीं है। जैसा आपने कहा है, प्रकृति आपकी अध्यक्षता में उसी तरह कार्य करती है, जिस तरह कोई सरकारी अधिकारी मुख्य कार्यकारी के आदेशों पर काम करता है। अधीनस्थ कार्यकलापों का आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि आप परब्रह्म है और सारे नियम आप में अवस्थित हैं और प्रकृति के सारे कार्यकलाप आपके द्वारा ही संचालित होते हैं अतः इनमें से कोई कार्यकलाप आप पर प्रभाव नहीं डालता।
आप शुक्लम कहलाते हैं शुक्लम अर्थात् धवल परम सत्य का प्रतीकात्मक निरूपण है क्योंकि भौतिक गुणों से यह अप्रभावित रहता है। ब्रह्माजी रक्त अथवा लाल कहलाते हैं, क्योंकि सृजन के लिए वे रजोगुण का प्रतिनिधित्व करते हैं। तमस शिवजी के जिम्मे में पड़ा है, क्योंकि वे संपूर्ण सृष्टि का संहार करते हैं। इस दृश्य जगत का सृजन, सहार तथा पालन आपकी शक्तियों द्वारा संपन्न होता है, तो भी आप इन गुणों से अप्रभावित रहते हैं। जैसा कि वेदों द्वारा पुष्ट किया गया है- हरि ही निर्गुण: साक्षात्- श्री भगवान सदैव ही समस्त भौतिक गुणों से मुक्त होते हैं। यह भी कहा जाता है कि परमेश्वर में रजो तथा तमो गुणों का अभाव रहता है।
"हे प्रभु! आप परम नियंता,भगवान तथा इस दृश्य जगत की व्यवस्था को बनाए रखने वाले हैं। आपके अवतार का कारण संसार के उन आसुरी शासकों के अनुयायियों का वध करना है, जो राजकुमारों के वेश में रहते हुए वस्तुतः असुर हैं। मुझे विश्वास है कि आप उन सबों को उनके अनुयायियों तथा सैनिकों समेत मार डालेंगे।
"मुझे विदित है कि आप दुष्ट कंस तथा उसके अनुयायियों का वध करने के लिए अवतरित हुए हैं। किंतु यह जानकर कि आप उसे तथा उसके अनुयायियों का वध करने के लिए अवतरित होंगे, उसने आपके कई पूर्वजों या अग्रजो को मार डाला है। अब वह केवल आपके जन्म की प्रतीक्षा में हैं। जैसे ही वह इसे सुनेगा, वह आप को मारने के लिए सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर उपस्थित होगा।"
वसुदेव की इस प्रार्थना के बाद कृष्ण की माता देवकी ने प्रार्थना की। वे अपने भाई के अत्याचारों से अत्यंत भयभीत थी। "देवकी ने कहा," हे प्रभु! वैदिक साहित्य में आपके अनेक शाश्वत अवतारों का मूल अवतारों के तौर पर वर्णन हुआ है, यथा नारायण, राम, हयशीर्ष, वराह, नरसिंह, वामन, बलदेव विष्णु से उद्धत ऐसे लाखों अवतार। आप मूल अवतार हैं क्योंकि आपकी अवतारों के सभी रूप इस भौतिक सृष्टि से बाहर हैं। आपका स्वरूप इस दृश्य जगत की उत्पत्ति के पहले से उपस्थित था। आपके स्वरूप शाश्वत तथा सर्व व्यापी हैं। वे स्वयं तेजोमय, अपरिवर्तनीय तथा भौतिक गुणों से कलुषित है। ऐसे शाश्वत रूप नित्य, ज्ञानमय तथा आनंदमय है। वे सभी दिव्य सात्विकता से पूर्ण तथा विभिन्न लीलाओं में सदैव निरत रहने वाले हैं। आपका कोई एक ही विशेष रूप नहीं होता। ऐसे अनेक दिव्य रूप स्वतंत्र हैं। मैं जानती हूं कि आप परमेश्वर विष्णु है।
"लाखों वर्षों बाद जब ब्रह्मा के जीवन का अंत होता है, तू दृश्य जगत का विलय हो जाता है। उस समय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश यह पांच तत्व महत् त्व में प्रवेश कर जाते हैं। यह महत् तत्व कालवश अप्रकट समग्र भौतिक शक्ति में प्रवेश करता है, समग्र भौतिक शक्ति प्रधान में और प्रधान आप में प्रवेश करता है। संपूर्ण दृश्य जगत के संहार के पश्चात केवल आपका दिव्य नाम, रूप, गुण तथा साज सामान ही शेष रह जाते हैं।
"हे प्रभु! मैं आपको सादर नमस्कार करती हूं, क्योंकि आप अव्यक्त समग्र शक्ति के निदेशक और भौतिक प्रकृति के परम आगार हैं। हे स्वामी! सारा दृश्य जगत, वर्ष के अथ से इती तक कालाधीन है। सभी आप के निर्देशन में कार्य करते हैं। आप हर वस्तु के मूल निदेशक तथा समस्त प्रबल शक्तियों के आगार हैं।
"अत: आप से मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे उग्रसेन के पुत्र कंस के क्रूर हाथों से बचाएं। कृपा करके मुझे इस भयावह स्थिति से उबारे क्योंकि आप अपने सेवकों की रक्षा करने के लिए सदैव उद्धत रहते हैं।" भगवान ने इस कथन की पुष्टि भगवत गीता में अर्जुन को आश्वस्त करते हुए की है, " तुम संसार को बता दो कि मेरा वक्त कभी नष्ट नहीं होता।"
इस प्रकार रक्षा करने के लिए प्रार्थना करते हुए माता देवकी ने अपना वात्सल्य व्यक्त किया: " मुझे ज्ञात है कि आपके इस दिव्य स्वरूप का दर्शन सामान्यतया ऋषि गण ध्यान में करते हैं, किंतु मैं अभी भी डर रही हूं कि ज्योही कंस को पता चल जाएगा कि आपका जन्म हो चुका है, तो वह आपको हानि पहुंचा सकता है। अतः मेरी प्रार्थना है कि आप इस समय हमारे भौतिक चक्षुओं से ओझल हो जाएं।" दूसरे शब्दों में, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे एक सामान्य बालक का रूप धारण कर ले। "आपके जन्म के कारण ही में अपने भाई कंस से भयभीत हूं। हे मधुसूदन! हो सकता है कि कंस को पता न लगे कि आपने जन्म धारण कर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि आप अपने इस चतुर्भुज रूप को जिसमें आप विष्णु के चार चिन्ह शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किए हैं, छुपा ले। हे प्रभु! आप दृश्य जगत के प्रलय के अंत में सारे ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करते हैं फिर भी आप अपनी विशुद्ध कृपा वश मेरे गर्भ में प्रकट हुए हैं। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए सामान्य मनुष्य के कार्यकलापों का अनुकरण करते हैं।"
देवकी की प्रार्थना सुनकर भगवान ने उत्तर दिया,"हे माता! स्वयंभू मनु के कल्प में मेरे पिता वसुदेव एक प्रजापति के रूप में थे जिसका नाम सुतपा था और आप उनकी पत्नी पृश्नि थी। उस समय ब्रह्मा ने प्रजा बढ़ाने की इच्छा से आपसे संतान उत्पन्न करने के लिए कहा। आपने अपनी इंद्रियों को वश में करते हुए कठोर तपस्या की। योग पद्धति में प्राणायाम का अभ्यास करते हुए आप पति-पत्नी दोनों ने वर्षा, वायु, कड़कती धूप जैसे भौतिक नियमों के सारे प्रभावों को सहन किया। आपने समस्त धार्मिक नियमों का पालन किया। इस प्रकार आपका हृदय निर्मल हो गया और भौतिक नियम के प्रभावों पर भी नियंत्रण प्राप्त हो गया। तपस्या करते हुए आप वृक्षों के नीचे भूमि पर गिरी हुई पत्तियों मात्र का आहार करती रही। तब स्थिर मन तथा इंद्रिय निग्रह द्वारा आपने मुझसे अद्भुत वर प्राप्त करने के लिए मेरी पूजा की। आप दोनों ने देवताओं की गणना के अनुसार 12000 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उस अवधि में आपका मन मुझ में ही लीन रहा। जब आप भक्ति कर रही थी और अपने मन में निरंतर मेरा ध्यान कर रही थी, तब मैं आपसे अत्यधिक प्रसन्न हुआ। हे निष्पाप माता! अतः आप का अंत: करण नित्य ही विशुद्ध है। उस समय भी मैं आपके समक्ष इसी रूप में आपकी इच्छा पूर्ति के लिए प्रकट हुआ था और आपसे मन वांछित वर मांगने के लिए कहा था। उस समय आप ने चाहा था कि मैं आपके पुत्र रूप में जन्म लूँ। यद्यपिआपने मेरा साक्षात दर्शन किया था, तथापि आपने मेरी माया के प्रभाव के कारण व्यापक भव बंधन से पूर्ण मुक्ति ना मांग कर मुझे अपने पुत्र के रूप में मांगा था।"
दूसरे शब्दों में,भगवान ने प्रकट होने के लिए इस जगत में पृश्नि तथा सुतपा के अपने माता पिता के रूप में चुना। जब भी भगवान मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं, उन्हें अपने माता-पिता की आवश्यकता होती है; फलत: उन्होंने पृश्नि तथा सुतपा को शाश्वत माता पिता के रूप में चुना; इसलिए पृश्नि तथा सुतपा दोनों ही मुक्ति की याचना ना कर सके। मुक्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितनी कि भगवान की दिव्य प्रेमा-भक्ति होती है। भगवान चाहते तो पृश्नि तथा सुतपा को तुरंत मुक्ति प्रदान कर सकते थे,किंतु अपनी विभिन्न अवतारों के लिए उन्हें इसी भौतिक जगत में बनाए रखना श्रेयस्कर समझा, जैसा कि आगे वर्णन किया जाएगा। भगवान से उनके माता-पिता बनने का वर प्राप्त करके पृश्नि तथा सुतपा दोनों तपस्या छोड़कर घर चले आए और पति-पत्नी के रूप में रहने लगे जिससे वे साक्षात परमेश्वर को पुत्र रूप में उत्पन्न कर सकें।
कालक्रम से पृश्निगर्भवती हुई और एक शिशु को जन्म दिया। भगवान ने वसुदेव तथा देवकी से कहा : "उस समय मेरा नाम पृश्निगर्भ था। अगले कल्प में आपने अदिति तथा कश्यप के रूप में जन्म लिया और तब मैं उपेंद्र नाम से आपका पुत्र बना। उस समय मेरा स्वरूप एक बौने जैसे था जिसमें में वामन देव के नाम से विख्यात हुआ। मैंने आपको वर दिया था कि मैं तीन बार आपके पुत्र रूप में जन्म धारण करूंगा। पहली बार मैं पृश्नि तथा सुतपा से जन्म लेकर पृश्निगर्भ कहलाया, दूसरी बार आदित्य तथा कश्यप से जन्म लेकर उपेंद्र कहलाया और तीसरी बार में देवकी तथा वसुदेव से कृष्ण नाम से उत्पन्न हुआ हूं। मैं इस विष्णु रूप में इसलिए अवतरित हुआ हूं कि आपको विश्वास दिला सकूं कि उसे श्री भगवान ने पुनः जन्म धारण किया है। मैं चाहता तो एक सामान्य शिशु के रूप में प्रकट हो सकता था, किंतु तब आपको विश्वास नहीं होता कि आप के गर्भ से मुझ भगवान ने ही जन्म लिया है। हे मेरे माता पिता! इस तरह आपने कई बार अत्यंत लाड-प्यार से अपने पुत्र के रूप में मुझे पाला-पोसा है, अतः मैं अत्यधिक प्रसन्न हूं और आपका अत्यंत कृतज्ञ हूं। मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस बार आप अपने उद्देश्य को पूरा करके भगवत धाम को वापस जाएंगे। मैं मानता हूं कि आप मेरे लिए चिंतित हैं और कंस से भयभीत हैं, अतः मेरा आदेश है कि आप तुरंत ही मुझे गोकुल ले चले और यशोदा की नवजात कन्या से जो अभी-अभी उत्पन्न हुई है, मुझे बदल दें।"
अपने माता पिता को इस प्रकार कहकर उनकी उपस्थिति में भगवान सामान्य बालक बन गए और मौन हो गए।
भगवान का आदेश पाकर वसुदेव अपने पुत्र को प्रसूति गृह से बाहर ले जाने के लिए तैयार हो गए। ठीक उसी समय नंद तथा यशोदा के एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वह योग माया थी, अर्थात वह भगवान की अंतरंगा आ सकती थी। इस योग माया के प्रभाव से कंस के महल के सारे निवासी और विशेष रूप से द्वारपाल गहरी नींद में सो गए और लोह श्रृंखलाओं से बंद महल के सारे दरवाजे खुल गए। रात अत्यंत अंधेरी थी, किंतु जो ही वसुदेव कृष्ण को अपनी गोद में लेकर बाहर निकले, तो उन्हें सबकुछ दिखने लगा मानो सूर्य का प्रकाश हो।
चैतन्यचरितामृत में कहा गया है कि कृष्ण सूर्य प्रकाश के तुल्य हैं और जहां भी कृष्ण रहते हैं वहां अंधकार रूपी माया नहीं रह सकती। जब कृष्ण को वसुदेव ले जा रहे थे, तब रात्रि का अंधकार दूर हो गया। कारागार के सारे द्वार स्वत: खुल गए। साथ ही आकाश में गंभीर गर्जना हुई और भीषण वृष्टि होने लगी। जब वसुदेव इस वर्षा में अपने पुत्र को ले जा रहे थे,तो भगवान शेष ने नाक का रूप धारण करके वसुदेव के सिर के ऊपर अपने फन फैला दिए जिससे वृष्टि से उन्हें बाधा ना पहुंची। वसुदेव यमुना के तट पर आए, तो देखा कि यमुना के जल में गरजती लहरें उठ रही है और सारा पाट फेनिल हो उठा है। इतने पर भी यमुना ने वसुदेव को नदी को पार करने के लिए मार्ग दे दिया, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सेतुबंध के समय हिंद महासागर ने भगवान रामचंद्र को रास्ता दे दिया था। इस प्रकार वसुदेव ने यमुना पार की। उस पार वे नंद महाराज के गोकुल स्थित निवास स्थान में गए जहां उन्होंने देखा कि सारे ग्वाले गहरी नींद में सोए हुए थे। इस अवसर का लाभ उठाकर वे यशोदा के घर में चुपके से घुस गए और बिना किसी कठिनाई के अपने पुत्र को रखकर बदले में यशोदा की नवजात पुत्री को उठा लाए। इस प्रकार चुपके से घर में घुसकर लड़के को लड़की से बदलकर वे पुनः कंस के कारागार में लौट आए तथा पुत्री को देवकी की गोद में रख दिया। उन्होंने पुनः हथकड़ी-बेड़ियां पहन ली जिससे कंस को यह पता ना चले की इतनी सारी घटनाएं घट चुकी है।
माता यशोदा समझती थी कि उनके एक शिशु उत्पन्न हुआ है, किंतु प्रसव पीड़ा से थक जाने के कारण वे प्रगाढ़ निद्रा में थी। जब वे जागीं, तो उन्हें याद ना रहा कि उनके पुत्र हुआ है या पुत्री।
इस प्रकार भगवान कृष्ण का जन्म हुआ।
No comments:
Post a Comment